Friday, January 28, 2011

बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !!

सच तो ये है, ये गांधी का वतन है
सुनता नहीं कोई, पढ़ता नहीं कोई
गांधी की राहों पे चलता नहीं कोई
सत्य-अहिंसा का पाठ पढाता तो हूँ मैं
पर, सत्य-अहिंसा का पुजारी नहीं हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

गांधी के तीनों बन्दर, बसते हैं जहन में
उन्हीं को देख-देख बढ़ता रहा हूँ
भाईचारे व सदभाव का जब उठता है मुद्दा
मुंह पे हाथ रख बैठा रहा हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

हिन्दू-मुस्लिम समभाव, सदभाव
एकता की जहां होती है चर्चा
वहां कान पे हाथ होते हैं मेरे
वहां बैठ कुछ मैं सुनता नहीं हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

जहां कत्ले-आम होते हैं हर पल
जलती हैं बस्ती, टूटते हैं घरौंदे
सच तो ये है, मैं होता वहीं हूँ
मगर आँखें मेरी कुछ देखती नहीं हैं
आँखों पे रख हाथ बैठा रहा हूँ
बन्दर तो हूँ मैं, पर गांधी नहीं हूँ !

1 comment:

Kailash C Sharma said...

बहुत सटीक प्रस्तुति..वास्तव में आज हम सब गांधी जी के तीन बन्दर ही होकर जी रहे हैं...बहुत सुन्दर सार्थक प्रस्तुति..