Thursday, January 6, 2011

छाने लगा है जूनून जीने का, लम्हे लम्हे में !

सिर पे बांध के कफ़न, वो घर से निकल आया था
तूफ़ान जब ठहरे, तो लोगों ने उसे ‘खुदा’ माना था !
.....

अब चंद लम्हें भी, सदियों से हो चले हैं
छाने लगा है जूनून जीने का, लम्हे लम्हे में !
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चलो अच्छा हुआ जो तुम, खिड़की से नीचे उतर आये
बिना दीदार कड़कती ठंड में, शायद हम ठिठुर जाते !
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कहाँ उलझे रहें हम, मिलने बिछड़ने के फसानों में
चलो दो-चार पग मिलकर रखें, हम नए तरानों में !
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एक तेरे ही नाम से, वतन में शान है मेरी
क्या उसको मिटा कर, मुझे गुमनाम होना है !
…..
‘उदय’ अब तू ही बता दे, रास्ता इंसान को
खा रहे रोटी वतन की, कर रहे सौदा वतन का !

3 comments:

ZEAL said...

bahut badhiya.

सतीश सक्सेना said...

अच्छा लिखा है दोस्त !नए वर्ष पर आपको हार्दिक शुभकामनायें !

अरुण चन्द्र रॉय said...

badhiya gazal... nav varsh kee hardik shubhkaamna...