Saturday, January 8, 2011

वतन के शिल्पी होकर, जो गददार बन बैठे !

कहाँ से चले थे, कहाँ आ गये हम
हमें न मिले वो, जो कश्में भुला गये ।
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‘उदय’ से लगाई थी आरजू हमने
अब क्या करें वो भी हमारे इंतजार मे थे।
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चाहें तो सारी दुनिया भुला सकते हैं
न चाहें तो कैसे भुलाएँ हम तुम्हे।
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वतन की खस्ताहाली से, मतलब नहीं उनको
वतन के शिल्पी होकर, जो गददार बन बैठे।
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झौंके बन चुके हैं हम हवाओं के
तेरी आँखों को अब हमारा इंतजार क्यों है।
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‘उदय’ तेरी नजर को, नजर से बचाए,
जब-भी उठे नजर, तो मेरी नजर से आ मिले।
(नजर = आँखें , नजर = बुरी नजर/बुराई)
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‘उदय’ तेरी आशिकी, बडी अजीब है
जिससे भी तू मिला, उसे तन्हा ही कर गया।
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‘उदय’ तेरे शहर में, हसीनों का राज है
तुम भी हो बेखबर, और हम भी हैं बेखबर ।
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न चाहो उन्हे तुम, जिन्हे तुम चाहते हो
चाहना है, तो उन्हे चाहो, जो तुमको चाहते हैं।
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हुई आँखें नम, तेरे इंतजार में ‘उदय’
कम से कम, अब इन्हें छलकने तो न दो ।

1 comment:

deepak saini said...

एक बार फिर बेहतरीन शेर