Sunday, July 3, 2011

कफ़न का टुकड़ा !

गर नहीं लड़ा मैं आज भयंकर तूफानों से
कल छोटी फूंको से भी मैं गिर सकता हूँ !

है कद-काठी मेरी, आज भले छोटी ही सही
पर जज्बातों के तपते तूफां लेकर चलता हूँ !

जब नहीं डरा, खुद के दहकते जज्वातों से
फिर कैसे झूठे अल्फाजों से डर सकता हूँ !

बंधने को बंध जाते, लोग प्रेम के बंधन में
मैं तो माँ धरती का कर्ज चुकाते चलता हूँ !

जब नहीं डरा लड़ने से, फिरंगी शैतानों से
फिर कैसे घर के हैवानों से डर सकता हूँ !

होंगे लोग मौत के डर से, घर से निकलें
मैं सिर पे बाँध कफ़न का टुकड़ा चलता हूँ !!

8 comments:

एम सिंह said...

वाह क्‍या बात है
बहुत अच्‍छा लिखा.


मेरा ब्‍लॉग - दुनाली

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 07 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच-- 53 ..चर्चा मंच 566

रश्मि प्रभा... said...

है कद-काठी मेरी, आज भले छोटी ही सही
पर जज्बातों के तपते तूफां लेकर चलता हूँ !
nihsandeh...

S.M.HABIB said...

सुदर रचना उदय भाई...
सादर..

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत उम्दा रचना.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

ओजस्वी रचना....

हर शेर अर्थपूर्ण.....

अनामिका की सदायें ...... said...

ek sambal deti umda rachna.

गीता पंडित said...

होंगे लोग मौत के डर से, घर से न निकलें
मैं सिर पे बाँध कफ़न का टुकड़ा चलता हूँ !!


वाह....
नि:शब्द हूँ आपकी गज़ल पढकर...आभार...