Wednesday, April 20, 2011

सांथी

वह शाम को
थका-हारा सा आया
मुझसे मिला, गले लगा
सांथ सांथ खाया-पिया
फिर सारी रात
हौले हौले
वह मुझमें समाता गया
समाया रहा, सारी रात, मुझमें
रात गुज़री
सब हुई
हौले हौले निकला बाहर
हंसता, खिलता, निखरता
मुझे निहारता, पुचकारता
फिर, स्नान-ध्यान कर
सुबह का नाश्ता कर
मुझे चूमते-चामते
हाँथ में ब्रीफकेस उठा
रोज की तरह, फिर
चला गया, आफिस की ओर !!

2 comments:

संजय भास्कर said...

Beautiful as always.
It is pleasure reading your poems.

संजय भास्कर said...

अद्भुत सुन्दर बेहतरीन नज्म! आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है!