नया सवेरा

‘उदय’ कहता है मत पूछो, क्या आलम है बस्ती का / हर किसी का अपना जहां, अपना-अपना आसमां है !

Friday, April 22, 2011

... जन लोकपाल बिल !


Posted by नया सवेरा at 9:59 AM
Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest
Labels: प्रिंट मीडिया में मेरी कलम

No comments:

Post a Comment

Newer Post Older Post Home
Subscribe to: Post Comments (Atom)
My photo
नया सवेरा
View my complete profile
..... !! श्याम कोरी 'उदय' !! .....

जन्म - १९६९
स्थान - ग्राम - उदयपुर, तहसील - गंज बासौदा, जिला - विदिशा
( मध्यप्रदेश )
शिक्षा - बी. कॉम.
( पं रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ )
भाषा - हिन्दी, अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, बुन्देलखंडी
लेखन - कविता, कहानी, लघुकथा, हास्य-व्यंग्य, शेर व समसामयिक मुद्दों पर स्वतंत्र लेखन
खेल - शतरंज, बेडमिन्टन, क्रिकेट
संपर्क - 9300957752
shyamkoriuday@gmail.com

Blog Archive

  • ▼  2011 (460)
    • ►  November (51)
    • ►  October (90)
    • ►  September (42)
    • ►  August (23)
    • ►  July (63)
    • ►  June (23)
    • ►  May (9)
    • ▼  April (48)
      • आँखें !
      • चाहत !
      • दुपट्टा !
      • ख़्वाबों की ओर !
      • जय जय जय !
      • ... सवालों के कटघरे !
      • पत्रकार और साहित्यकार !
      • जन लोकपाल बिल : सवालों के कटघरे !
      • राजा-रानी !
      • ... जन लोकपाल बिल !
      • सांथी
      • सपने
      • ख़्वाब !
      • ... बुर्के पर प्रतिबन्ध !
      • ... सांठ-गांठ की नीति !
      • न्यायपालिका और जन लोकपाल !
      • अन्ना हजारे !
      • तुम क्या हो !
      • खामोशी !!
      • फ्रांस में बुर्के पर प्रतिबन्ध जल्दबाजी का फैसला !
      • भ्रष्टाचार !
      • अंधकार !
      • ताप !
      • शोर !
      • "ज्वलनशील बाबाओं" से आहत होते "ऊर्जावान बाबा"
      • एक सबक : पटकनी !
      • ... पुरुष देख के खुश, तो महिला दिखा के खुश !
      • लालची बुढडा !
      • मर्जी के मालिक !
      • खजाना !
      • दानवीर सेठ !
      • भ्रष्टाचार का बोलबाला !
      • मुफ़्त की नसीहते !
      • भ्रष्टाचार : त्राहिमाम त्राहिमाम !
      • जन लोकपाल बिल !
      • दुर्भावनाओं से ग्रसित नामी-गिरामी कलमकार !
      • जन लोकपाल बिल : भ्रांतियों का दुष्प्रचार !
      • सूतम-सूत !!
      • पतझड़ !
      • सच ! जिन्दगी, उदास है मेरी !!
      • उड़ान !
      • दस्तूर !
      • गर्म रातें !!
      • तन्हाई !
      • क्रिकेट ! आज हम विश्व विजेता हैं !!
      • शब्द - निशब्द !
      • स्पर्श !
      • अंकुरित !!
    • ►  March (16)
    • ►  February (29)
    • ►  January (66)
  • ►  2010 (23)
    • ►  December (17)
    • ►  November (6)

Labels

  • कविता (351)
  • नक्सलवाद (4)
  • प्रिंट मीडिया में मेरी कलम (7)
  • मनन - चिंतन (7)
  • लघुकथा-कहानी-हास्य-व्यंग्य (62)
  • विविध (1)
  • शेर (46)
  • समसामयिक (21)

Popular (Last 7 days)

  • जन लोकपाल बिल : सवालों के कटघरे !
    जन लोकपाल बिल को पारित किये जाने तथा जन लोकपाल के गठन को लेकर विगत दिनों अन्ना हजारे ने अपने समर्थकों व सहयोगियों के ...
  • गर्म रातें !!
    अब रातें गर्म हो चली हैं उतनी ही , जितनी तुम्हारे सांथ होने पर सर्द रातें , गर्म हुआ करती थीं पर उन रातों में , तुम होत...
  • भ्रष्टाचाररूपी महामारी : असहाय लोकतंत्र !
    भ्रष्टाचार वर्त्तमान समय में कोई छोटी - मोटी समस्या नहीं रही वरन यह एक महामारी का रूप ले चुकी है महामारी से तात्पर्य एक...
  • कुंवारे
    कल रात तसलीमा रस्ते में मिल गई हॉट, सेक्सी, अर्द्धनग्न मगर अफसोस - अब क्या कहें ! मैंने कहा - मैडम, कहाँ जा रही हैं ? जवाब - जन्नत क...
  • धन्ना सेठ
    धन्ना सेठ गाँव का , सबसे अमीर जानते थे सब उसको दौलतें पीठ पे बांध चलता सिर हाने रख सोता था चिलचिलाती धूप में , सड़क पर ...
  • कडकडाती ठण्ड : प्रेम कहानी !
    कल रात बेचैनी थी नींद खुल गई बिस्तर पर पड़े पड़े करवट बदलता रहा दस से पंद्रह मिनट फिर उठकर बैठ गया ! थोड़ी देर बाद ह...
  • चमचागिरी !!
    एक दिन अचानक कप्तान साहब गुस्से-गुस्से में सरप्राईस चेक हेतु एक थाने में गुस गये और "सरप्राईस चेकिंग" करने लगे, थानेदार भौंचक्का...
  • मैं दलाल नहीं हूँ !
    हाँ भई मैं खबरीलाल ही हूँ नहीं , मैं दलाल नहीं हूँ और न ही बिचौलिया हूँ हाँ , अगर आप चाहें तो मुझे एक गुड मैनेजर एक्स...
  • आजादी की दरकार
    पुरुष धरा तो औरत आकाश है पुरुष नदी तो औरत सागर है पुरुष पवन तो औरत संसार है पुरुष फूल तो औरत श्रृंगार है चंहू ओर औरत ही औरत है फिर...
  • सफ़र में फ़ासले हैं, गुजर ही जायेंगे !
    तेरी जुबां का ईमान देखकर, तेरी आंखों से यकीं उठ चला है कभी हां, कभी ना, अब तू ही बता, ये क्या फ़लसफ़ा है ! ..... न टूटा था कभी, न टूटेगा ‘उ...

Popular (All time)

  • बेचैनी
    कुछ अजब कुछ गजब सन्नाटा सा था चंद रातें कभी सोतीं कभी जागतीं खुली आँखों से कभी कभी मूंदकर आँखें मैं देखता सा था ! क्या था क्यों था...
  • होली !
    होली आई , आई होली लेकर आई , खुशियां होली रंग - गुलाल , छेड - छाड गली - चौबारे , घर - आंगन गुजिया - सलोनी , लडडू - पेडे मौज - मस्ती...
  • गुरु की महिमा
    सत्य के पथ पर चलते चलते मिलते कुछ अंधियारे हैं ! सांथ गुरु की कृपा हो तब हो जाते उजियारे हैं ... गुरु की महिमा गुरु ही जाने भक्त तो...
  • चमचागिरी और चापलूसी !
    एक दिन मैं भी, घंटों बैठकर एकांत में, सोचता रहा चमचागिरी और चापलूसी में आखिर, बुराई क्या है लोग क्यों बुरी नजर से, देखते हैं किसी चम...
  • कंजूस खोपडी !
    एक दिन ट्रैन में यात्रा के दौरान सामने वाली सीट पर एक महाशय को सूट-बूट मे आस-पास बैठे यात्रियों के साथ टाईमपास करते देखा, वह देखने से धनव...
  • 'सत्य-अहिंसा' के पथ पर
    चलो लड़ लें किसी न किसी से , आज लड़ ही लें किसी न किसी से ही क्यों किसी से भी लड़ लें जब लड़ना ही है , तब सोचना...
  • हवस
    हवस की आग से चाहे जैसे भी हो, तुम बाहर निकल आओ कहीं ऐंसा न हो कि - खुद ही - जल के ख़ाक हो जाओ !
  • सफ़लता का मूल मंत्र !
    आज मानव जीवन बेहद तेज गति से चलायमान है , प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ़ अपने आप में मशगूल है, उसके आस - पास क...
  • हार-जीत !
    हर पल, पाने की चाह कुछ पल के लिये अच्छी है समर्पण की भावना सदा के लिये अच्छी है जरा सोचो हमने क्या खोया - क्या पाया और जरा सोचो तुमन...
  • मंहगाई, सरकार, जनसंसद ... जय हो !
    मंहगाई, उफ़ ! जानलेवा मंहगाई अभी अभी, कुछ देर पहले मैं सोच रहा था, सोच रहा हूँ सच ! सोचने के लिए मजबूर हूँ !! कि - यदि, इसी तरह पेट्रोल...
Watermark theme. Powered by Blogger.