Sunday, April 17, 2011

तुम क्या हो !

तुम क्या हो
मैं, समझना चाहता हूँ
कभी तुम में
दिखती है, मुझे
सूर्य सी गर्मी
कभी तुम
चाँद सी शीतल लगे हो !

तुम क्या हो
कभी तुम एक-सी
दिखती नहीं, मुझको
कभी देखा, तुम
झरने सी खिल-खिल
बहती लगे हो
तो, कभी, फिर
झील-सी गहरी लगे हो !

तुम क्या हो
क्यों हो, यही, मैं
समझना चाहता हूँ
कभी छू-कर
मुझे, तुम
छाँव सी शीतल करे हो
तो, कभी, फिर
छूकर, मुझे
तुम आग का शोला करे हो !

तुम क्या हो
क्या-क्या, नहीं हो
कभी तुम
रात में, मुझको
काम की देवी लगे हो
सुबह देखूं
तो, तुम , मुझको, फिर
लक्ष्मी की मूरत लगे हो !

तुम क्या हो
बताओ, तुम, खुद मुझे ही
या, फिर, मुझे
तुम, कुछ घड़ी का
वक्त, जज्बा, हौसला, दे दो
मैं, तुम में, डूबकर
तुम्हें, समझना चाहता हूँ
कि, तुम, क्यों, मुझे
चाँद, सूरज, धरा, अम्बर
नीर, पवन, पुष्प, सुगंध
नारी, अप्सरा, देवी, सी लगे हो !!

2 comments:

एम सिंह said...

बेहतरीन लेखन के लिए मेरी बधाई स्वीकारें.
मेरे ब्लॉग पर आयें, आपका स्वागत है
बचें ऑनलाइन जॉब्स की धोखाधड़ी से

संजय भास्कर said...

.शब्दों को चुन-चुन कर तराशा है आपने ...प्रशंसनीय रचना।