Thursday, February 10, 2011

बाजार !

आज के बदले इस युग मे ,
बाजार बनी ये दुनिया है ,
इंसा का ईमान है क्या ,
इंसा ही खरीदे जाते हैँ ,

अस्मिता बनी एक वस्तु है ,
"शो-केस" मे दिख जाती है ,
अस्मिता का कोई मोल नही ,
बस बिकती है - बस बिकती है !!

1 comment:

संजय भास्कर said...

कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई