Friday, July 29, 2011

घुप्प अंधेरा

किसी सुनसान, सन्नाटे भरे
इलाके से, अकेले
जब गुजरते थे, हम
बचपन में !
तब
दिल, दिमाग, हाँथ, पैर 

सन्न से हो जाते थे
गुजरते गुजरते
गुजर जाने तक
कभी कभी तो
गुजर जाने के बाद भी
कुछ दूर तक, सन्नाटा-सा
छाया रहता था
पर, तब से अब तक
हमने, कभी, सोचा नहीं था
डरे भी नहीं थे
सहमे भी नहीं थे
चल रहे थे
चलते चल रहे थे
बस चले-चल रहे थे
कि -
अचानक, कल, फिर
एक खबर सुनकर, चहूँ ओर
सन्नाटा-सा छा गया
सुन, सुनते ही
छा गया घुप्प अंधेरा
दिल और दिमाग पर ... !!

परेशां हालात

परेशानियां, मुश्किलें, तकलीफें
कभी उमड़ पड़ती हैं
कभी ठहरी होती हैं
शब्द, भाव, विचार, की तरह
आसमां में
जमीं में
फिजाओं में
मन के किसी कोने में !
फिर किसी दिन अचानक ही
किसी तूफ़ान
किसी बवंडर
किसी भूकंप
किसी जलजले
किसी सुनामी, की तरह
उमड़ पड़ती हैं
और हम
असहाय उनके सामने खड़े होते हैं
घिरे होते हैं
खुद को देखते, टटोलते
मुश्किल, परेशां हालात में !!

Thursday, July 28, 2011

दिग्गी - पिग्गी !

चिल्ले-पिल्ले, आंडू-पांडू
ढोल-नगाडे, डफ़ली-बाजा
पीटम-पीट, धमा-चौकडी
अकड रहा है, जकड रहा है
बेमतलब का भिड रहा है
मारो मारो, पकडो पकडो
दे दो एक पटकनी उसको
दिग्गी हो या हो पिग्गी !
धोबी पछाड दिखाओ उसको
उठा-उठा के पटको उसको
है इसकी दुम टेडी की टेडी
आदत से मजबूर हुआ है
भौं भौं करता घूम रहा है
अच्छा-बुरा सब भूल गया है
अकड रहा है, जकड रहा है
बेमतलब का भिड रहा है
मारो मारो, पकडो पकडो
दे दो एक पटकनी उसको
दिग्गी हो या हो पिग्गी !!