तेरी खामोशियों का, क्या मतलब समझें
तुझे उम्मीद है, या इंतजार है ।
...
वक्त गुजरे, तो गुजर जाये
तेरे आने तक, इंतजार रहेगा हमको ।
...
आसमां तक रोशनी चाहते क्यों हो
घरों के अंधेरे तो दूर हों पहले ।
...
खुदा की सूरतें हैं क्या, खुदा की मूरतें हैं क्या
न तुम जाने, न हम जाने ।
...
अंधेरे जिन्हे रास नही आते
उनकी राहों मे रौशनी खुद-व-खुद आ जाती है।
...
चलो लिख दें इबारत कुछ इस तरह
जिसे पढकर रस्ते बदल जाएँ।
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वो भी तन्हा रह गए, हम भी तन्हा रह गए
उनकी खामोशियाँ, भी सिसकती रह गईं।
...
फक्र कर पहले जमीं पर
फिर करेंगे आसमां पर।
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होते हैं हालात, मौत से बदतर
जो जीते-जी मौत दिखा देते हैं।
...
हम जो लिख दें, तो समझ लो क्या लिखा है
तुम जो पढ लो, तो समझ लो क्या लिखा है।
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दौलतें बाँधकर पीठ पर ले जायेंगे
जमीं पे गददारी के निशां छोड जायेंगे।
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क्यूँ रोज उलझते-सुलझते हो मोहब्बत में
क्या हँसते-मुस्कुराते जीना खुशगवार नहीं ।
...
तौबा कर लेते मोहब्बत से
गर तेरे इरादे भाँप जाते हम।
...
चमचागिरी का दौर बेमिसाल है
चमचों-के-चमचे भी मालामाल हैं।
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रोज सपनों मे तुम यूँ ही चले आते हो
कहीं ऎसा तो नहीं, सामने आने से शर्माते हो।
...
कदम-दर-कदम रास्ते घटते गए और फासले बढते गये
फिर हौसले बढते गये, और मंजिलें बढती गईं ।
...
‘खुदा’ तो है ‘खुदा’ तब तक, जब तक हम ‘खुदा’ मानें
कहाँ है फिर ‘खुदा’, जब न ‘खुदा’ मानें !
...
‘उदय’ जाने, अब हमारी चाहतें हैं क्या
अब तक जिसे चाहा, वही बेजुवाँ निकला।
...
कहां अपनी, कहां गैरों की बस्ती है
जहां देखो, वहीं पे बम धमाके हैं।
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लिखते-लिखते क्या लिखा, क्या से क्या मैं हो गया
पहले जमीं , फिर आसमाँ, अब सारे जहां का हो गया।
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सजा-ए-मौत दे दे, या दे दे जिंदगी
चाहे अब न ही कह दे, मगर कुछ कह तो दे।
...
बसा लो तुम हमें, अपने गिरेबां में
दिलों में अब, है आलम बेवफाई का।
...
वो मिले, मिलते रहे तन्हाई में
भीड में, फिर वो जरा घबरा गये।
...
आज दुआएँ भी हमारी, सुन लेगा ‘खुदा’
जमीं पे, गम के साये में, खुशी हम चाहते हैं।
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तुमने हमारी दोस्ती का, क्यूं इम्तिहां लिया
तुम इम्तिहां लेते रहे, और दूरियाँ बढती रहीं।
...
मिट्टी के खिलौनों की दुकां, मैं अब कहां ढूंढू
बच्चों के जहन में भी, तमंच्चे-ही-तमंच्चे हैं।
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मेरे अंदर ही बैठा था ‘खुदा’, मदारी बनकर
दिखा रहा था करतब, मुझे बंदर बनाकर।
...
कब तलक तुमको अंधेरे रास आयेंगे
झाँक लो बाहर, उजाले-ही-उजाले हैं ।
...
छोड के वो मैकदा, तन्हा फिर हो गया
हम दोस्त नहीं , तो दुश्मन भी नहीं थे।
...
हम भी करेंगे जिद, अमन के लिये
देखते हैं, तुम कितने कदम साथ चलते हो।
...
दिखाते हो वहाँ क्यूँ दम, जहाँ पे बम नही फटते
बच्चों के खिलौने तोडकर, क्यूँ मुस्कुराते हो।
...
‘मसीहे’ की तलाश में दर-दर भटकते फिरे
‘मसीहा’ जब मिला, तो अपने अन्दर ही मिला।
...
हो शाम ऎसी कि तन्हाई न हो
मिले जब मोहब्बत तो रुसवाई न हो।
...
प्यार हो, तो दूरियाँ अच्छी नहीं
दुश्मनी हो, तो फिर दोस्ती अच्छी नहीं।
...
सत्य के पथ पर, अब कोई राही नहीं है
गाँधी के वतन में, अब कोई गाँधी नहीं है ।
...
मेरी महफिल में तुम आये, आदाब करता हूँ
कटे ये शाम जन्नत सी, यही फरियाद करता हूँ ।
Monday, January 17, 2011
Monday, January 10, 2011
यारों से, रकीबों के रिवाज अच्छे हैं !
पैसा बडा है, ईमान बदल दे
पर इतना भी नहीं, कुदरत को बदल दे !
.....
नही है खौफ बस्ती में, तेरी खुबसूरती का
खौफ है तो, तेरी कातिल अदाएँ हैं ।
.....
बडा मुश्किल है जीना, यारों के चलन में
यारों से, रकीबों के रिवाज अच्छे हैं ।
.....
कौन कहता है हिन्दू-मुस्लिम में फर्क है
नहीं है फर्क जन्मों में – नहीं है फर्क रक्तों में
फर्क है तो तेरी आँखों – तेरी बातों में फर्क है
न हिन्दू भी अलग है, न मुस्लिम भी अलग है।
.....
मिटटी के खिलौने हैं हम सब, मिटटी में ही रचते-बसते हैं
जिस दिन टूट-के बिखरेंगे, मिटटी में ही मिल जायेंगे ।
.....
फूलों में जबां तुम हो, खुशबू पे फिदा हम हैं
अकेले तुम तो क्या तुम हो, अकेले हम तो क्या हम हैं।
.....
हमें परवाह नही कि सितारे आसमां मे हों
हम तो देखते हैं आसमां ,सुकूं के लिये ।
.....
हमारी दोस्ती, ‘खुदा’ बन जाए है इच्छा
अब खुशबू अमन की, ‘खुदा’ ही बाँट सकता है ।
.....
तेरी मासुमीयत की दास्तां, कितनी सुहानी है
दिलों के कत्ल कर के भी, बडे बेखौफ बैठे हो ।
.....
दुश्मनी का अब, वक्त नही है
अमन के रास्ते मे, काँटे बहुत हैं।
.....
अभी भी वक्त है यारा, पलट के देख ले हमको
खुदा जाने, फिर कभी मौका न आयेगा ।
.....
कभी तुम रोज मिलते हो, कभी मिलते नहीं यारा
तुम्हारी ये अदाएँ भी, क्या कातिल अदाएँ हैं।
.....
छोड दूँ मैं मैकदा, क्यों सोचते हो
कौन है बाहर खडा, जो थाम लेगा।
.....
क्यूँ खफा हो, अब वफा की आस में
हम बावफा से, बेवफा अब हो गये हैं।
.....
तू तन्हा क्यों समझता है खुद को ‘उदय’
हम जानते हैं कारवाँ तेरे साथ चलता है।
.....
रोज आते हो, चले जाते हो मुझको देखकर
क्या तमन्ना है जहन में, क्यूँ बयां करते नहीं।
.....
तुम्हे फुर्सत-ही-फुर्सत है, ‘आदाब-ए-मोहब्बत’ की
हमें फुर्सत नहीं यारा, ‘सलाम-ए-मोहब्बत’ की ।
.....
कभी हम चाहते कुछ हैं, हो कुछ और जाता है
जतन की भूख है ऎसी, अमन को भूल जाते हैं ।
.....
हम जानते हैं तुम, मर कर न मर सके
हम जीते तो हैं, पर जिंदा नही हैं।
.....
पीछे पलट के देखने की फुर्सत कहाँ हमें
कदम-दर-कदम हैं मंजिलें बडी ।
पर इतना भी नहीं, कुदरत को बदल दे !
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नही है खौफ बस्ती में, तेरी खुबसूरती का
खौफ है तो, तेरी कातिल अदाएँ हैं ।
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बडा मुश्किल है जीना, यारों के चलन में
यारों से, रकीबों के रिवाज अच्छे हैं ।
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कौन कहता है हिन्दू-मुस्लिम में फर्क है
नहीं है फर्क जन्मों में – नहीं है फर्क रक्तों में
फर्क है तो तेरी आँखों – तेरी बातों में फर्क है
न हिन्दू भी अलग है, न मुस्लिम भी अलग है।
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मिटटी के खिलौने हैं हम सब, मिटटी में ही रचते-बसते हैं
जिस दिन टूट-के बिखरेंगे, मिटटी में ही मिल जायेंगे ।
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फूलों में जबां तुम हो, खुशबू पे फिदा हम हैं
अकेले तुम तो क्या तुम हो, अकेले हम तो क्या हम हैं।
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हमें परवाह नही कि सितारे आसमां मे हों
हम तो देखते हैं आसमां ,सुकूं के लिये ।
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हमारी दोस्ती, ‘खुदा’ बन जाए है इच्छा
अब खुशबू अमन की, ‘खुदा’ ही बाँट सकता है ।
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तेरी मासुमीयत की दास्तां, कितनी सुहानी है
दिलों के कत्ल कर के भी, बडे बेखौफ बैठे हो ।
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दुश्मनी का अब, वक्त नही है
अमन के रास्ते मे, काँटे बहुत हैं।
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अभी भी वक्त है यारा, पलट के देख ले हमको
खुदा जाने, फिर कभी मौका न आयेगा ।
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कभी तुम रोज मिलते हो, कभी मिलते नहीं यारा
तुम्हारी ये अदाएँ भी, क्या कातिल अदाएँ हैं।
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छोड दूँ मैं मैकदा, क्यों सोचते हो
कौन है बाहर खडा, जो थाम लेगा।
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क्यूँ खफा हो, अब वफा की आस में
हम बावफा से, बेवफा अब हो गये हैं।
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तू तन्हा क्यों समझता है खुद को ‘उदय’
हम जानते हैं कारवाँ तेरे साथ चलता है।
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रोज आते हो, चले जाते हो मुझको देखकर
क्या तमन्ना है जहन में, क्यूँ बयां करते नहीं।
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तुम्हे फुर्सत-ही-फुर्सत है, ‘आदाब-ए-मोहब्बत’ की
हमें फुर्सत नहीं यारा, ‘सलाम-ए-मोहब्बत’ की ।
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कभी हम चाहते कुछ हैं, हो कुछ और जाता है
जतन की भूख है ऎसी, अमन को भूल जाते हैं ।
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हम जानते हैं तुम, मर कर न मर सके
हम जीते तो हैं, पर जिंदा नही हैं।
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पीछे पलट के देखने की फुर्सत कहाँ हमें
कदम-दर-कदम हैं मंजिलें बडी ।
Saturday, January 8, 2011
वतन के शिल्पी होकर, जो गददार बन बैठे !
कहाँ से चले थे, कहाँ आ गये हम
हमें न मिले वो, जो कश्में भुला गये ।
.....
‘उदय’ से लगाई थी आरजू हमने
अब क्या करें वो भी हमारे इंतजार मे थे।
.....
चाहें तो सारी दुनिया भुला सकते हैं
न चाहें तो कैसे भुलाएँ हम तुम्हे।
.....
वतन की खस्ताहाली से, मतलब नहीं उनको
वतन के शिल्पी होकर, जो गददार बन बैठे।
.....
झौंके बन चुके हैं हम हवाओं के
तेरी आँखों को अब हमारा इंतजार क्यों है।
.....
‘उदय’ तेरी नजर को, नजर से बचाए,
जब-भी उठे नजर, तो मेरी नजर से आ मिले।
(नजर = आँखें , नजर = बुरी नजर/बुराई)
.....
‘उदय’ तेरी आशिकी, बडी अजीब है
जिससे भी तू मिला, उसे तन्हा ही कर गया।
.....
‘उदय’ तेरे शहर में, हसीनों का राज है
तुम भी हो बेखबर, और हम भी हैं बेखबर ।
.....
न चाहो उन्हे तुम, जिन्हे तुम चाहते हो
चाहना है, तो उन्हे चाहो, जो तुमको चाहते हैं।
.....
हुई आँखें नम, तेरे इंतजार में ‘उदय’
कम से कम, अब इन्हें छलकने तो न दो ।
हमें न मिले वो, जो कश्में भुला गये ।
.....
‘उदय’ से लगाई थी आरजू हमने
अब क्या करें वो भी हमारे इंतजार मे थे।
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चाहें तो सारी दुनिया भुला सकते हैं
न चाहें तो कैसे भुलाएँ हम तुम्हे।
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वतन की खस्ताहाली से, मतलब नहीं उनको
वतन के शिल्पी होकर, जो गददार बन बैठे।
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झौंके बन चुके हैं हम हवाओं के
तेरी आँखों को अब हमारा इंतजार क्यों है।
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‘उदय’ तेरी नजर को, नजर से बचाए,
जब-भी उठे नजर, तो मेरी नजर से आ मिले।
(नजर = आँखें , नजर = बुरी नजर/बुराई)
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‘उदय’ तेरी आशिकी, बडी अजीब है
जिससे भी तू मिला, उसे तन्हा ही कर गया।
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‘उदय’ तेरे शहर में, हसीनों का राज है
तुम भी हो बेखबर, और हम भी हैं बेखबर ।
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न चाहो उन्हे तुम, जिन्हे तुम चाहते हो
चाहना है, तो उन्हे चाहो, जो तुमको चाहते हैं।
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हुई आँखें नम, तेरे इंतजार में ‘उदय’
कम से कम, अब इन्हें छलकने तो न दो ।
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