Friday, January 28, 2011

क्या फर्क पड़ता है !

भईय्या आपने बैंक लूट लिया
एफ.आई.आर.हो जायेगी
छोड़ ना जाने दे, सब अपने हैं
क्या फर्क पड़ता है !

भईय्या चौक पे मर्डर कर दिया
पुलिस पकड़ कर ले जायेगी
छोड़ ना जाने दे, सब अपने हैं
क्या फर्क पड़ता है !

भईय्या आपने इज्जत लूट ली
चलो यहाँ से भाग चलते हैं
छोड़ ना जाने दे, सब अपने हैं
क्या फर्क पड़ता है !

भईय्या नेताजी को टपका दिया
चलो अब तो भाग चलते हैं
छोड़ ना जाने दे, सब अपने हैं
क्या फर्क पड़ता है !

भईय्या कप्तान को चांटा जड़ दिया
अब तो खैर नहीं, चलो निकल लें
छोड़ ना जाने दे, सब अपने हैं
क्या फर्क पड़ता है !

भईय्या कभी तो कुछ फर्क
नहीं, कभी नहीं, और पडेगा
क्यों, कैसे भईय्या
लोकतंत्र है सरकार हमारी है !

जिज्ञासा

सच ! हाँ जानती हूँ, तुम मुझे
निर्वस्त्र देखना चाहते हो
घंटों निहारना चाहते हो
सिर से पैरों तक
फिर पैरों से सिर तक
आगे से, पीछे से
अकेले में, रौशनी में
तुम चाहते हो
देखना मुझे निर्वस्त्र
अपनी मद भरी आँखों से !

सच ! तुम कितने लालायित हो
मैंने एक-दो बार भांपा है
तुम्हारी नजरें स्थिर बन
ठहर सी जाती हैं
कभी कभी, मुझ पर
कपडे बदलते समय
और तो और
एक-दो बार तुमने
मुझे नहाते समय देखने का
असफल प्रयास भी किया
किन्तु, तुम सहम गए !

तुम्हारी सालों की लालसा
चाहती हूँ, कर दूं पूरी
पर क्या करूं
शर्म के कारण
सच ! चाहकर भी सहम जाती हूँ
कल तो मैंने
मन ही बना लिया था
पर चाहते चाहते
शर्म उतर आई मन में
रुक गई, ठहर गई
नहीं तो कल रात
तुम्हारी जिज्ञासा
हो गई होती पूरी !

सच ! अब मुझसे भी
तुम्हारी लालसा
व्याकुलता, देखी नहीं जाती
देखें, कब तक, शर्म
रोक सकती है मुझको
या फिर, किसी दिन
शर्माते, लजाते ही
अपनी आँखों को, मूँद कर
मैं तुमसे, चुपके से, कह दूंगी
लो, कर लो पूर्ण
चुपके से, धीरे से
अपनी जिज्ञासा पूरी !!

न जाने, कौन जाने, कब तलक, चलना है मुझको ...

जाने, कौन जाने
कब तलक
चलना है मुझको
सफ़र है, रास्ते हैं
और मेरे पग
इरादों संग
निरंतर बढ़ रहे हैं !

मिलेंगी मंजिलें
रस्ते बड़े हैं
थकेंगे कभी
ये पग मेरे हैं
मेरे जज्बे, हौसले
पगों
संग
होड़ में आगे खड़े हैं !

सोचो तुम
थक कर, कहीं
मैं ठहर जाऊं
ये पग
जज्बे
इरादे
हौसले
मैंने गढ़े हैं !

चलो चलते रहो
बढ़ते रहो तुम
संग संग मेरे
पीछे रास्ते मैंने गढ़े हैं
सफ़र थोड़ा बचा है
चलो चलते रहें
सुकूं की सांस, लेंगे हम
पहुँच कर, मंजिलों पर !!