Saturday, November 19, 2011

बेचैनी

कुछ अजब
कुछ गजब
सन्नाटा सा था
चंद रातें
कभी सोतीं
कभी जागतीं
खुली आँखों से कभी
कभी मूंदकर आँखें
मैं देखता सा था !
क्या था
क्यों था
कुछ तो था
जिसने मुझे
बेचैन किया था !
थी अजब सी
कुछ बेचैनी
क्या थी
क्यों थी
यह सवाल बन
मेरे जहन में
घूमता सा था
चंद रातें
बेचैनी, सवाल
और मैं !!

हवस

हवस की आग से
चाहे जैसे भी हो, तुम
बाहर निकल आओ
कहीं ऐंसा न हो
कि -
खुद ही -
जल के ख़ाक हो जाओ !

Saturday, November 12, 2011

हॉट सीट पर प्रेमी !

प्रेमिका ने -
सामने हॉट सीट पर बैठे
अपने प्रेमी के सामने अंतिम प्रश्न रखा
मुझसे शादी करने के पीछे तुम्हारी लालसा क्या है ?

आप्शन -
- तुम मुझसे सच्चे दिल से प्यार करते हो !
बी - तुम मेरी दौलत से प्यार करते हो !
सी - तुम मेरे सांथ सोने की जिद में शादी करना चाहते हो !
डी - तुम्हारे पास कोई अन्य विकल्प नहीं है !

सवाल सुनकर-पढ़कर, प्रेमी सन्न रह गया -
सामने रखा एक गिलास पानी उठाकर पी गया !

प्रेमिका ने कहा -
तुम चाहो तो आख़िरी लाइफ लाइन "डबल डिप" ...
"डबल डिप" की शर्त तो तुम्हें मालुम ही है कि -
यदि गलत हुए तो -
हमेशा-हमेशा के लिए हमारा सांथ छूट जाएगा !
जीत गए तो फिर कोई बात ही नहीं है !!

प्रेमी ने गहरी सांस ली, और "डबल डिप" का आप्शन चुना
प्रेमिका ने कहा - अब तुम गेम क्विट नहीं कर सकते
बताइये - आपका पहला जवाब क्या है ?
प्रेमी ने कहा - आप्शन -
कंप्यूटर जी - यह गलत जवाब है आपका !

प्रेमी के माथे पर पसीना टपका -
और उठाकर दूसरा गिलास पानी भी गटका !!

प्रेमिका ने कहा - सोचिये और सोच कर जवाब दीजिये
आपका दूसरा आप्शन क्या है ?

प्रेमी ने खुद को गंभीर संकट में घिरा पाया
पर, जवाब देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नजर नहीं आया
आँख बंद की, गहरी सांस ली, फिर आँख खोलकर
जवाब दिया - आप्शन - डी
कंप्यूटर जी - "आप्शन - डी" पर ताला लगाया जाए !

कंप्यूटर जी ने ब्रेक के बाद जवाब दिया -
यह भी - गलत जवाब है आपका !

जवाब सुनते ही प्रेमी पसीने से तर-बतर हो गया
आँखों के सामने घुप्प अंधेरा छा गया !
प्रेमिका भी जवाब सुनकर अचंभित हुई
और कंप्यूटर जी से सही जवाब माँगा -
सही जवाब - आप्शन - सी ...

प्रेमी और प्रेमिका दोनों सन्न रह गए
और खुद--खुद दोनों, माथा पकड़ के रह गए !!

साहित्य की दुनिया

सुनते हैं, लोग
जीते जी -
उतने बड़े नहीं होते हैं
जितने बड़े -
मरने के बाद
खुद-ब-खुद हो जाते हैं !

मरने के बाद -
कोई कैसे बड़ा हो जाता है
यह सवाल मेरे जेहन में -
कूद रहा है
हिलोरें मार रहा है
गोते लगा रहा है
हुत-तू-तू कर रहा है !

काश ! मैं समझ पाता, जान पाता
कि -
मरने के बाद
ऐंसा क्या हो जाता है
कि -
साहित्यकार
खुद-ब-खुद बड़ा हो जाता है !!

साहित्य के सूरज

ये कैसी दुनिया है 'उदय'
जहां डूबते सूरज -
खुद ही सुनहरे हो रहे हैं !

ऊगते सूरज -
और चिलचिलाती धूप से
मूँद के आँख -
डर के किनारे हो रहे हैं !

आग, ताप, तेज, वेग
और ज्वलनशीलता
डूबता सूरज कहाँ से दे हमें !

जो दे सके है, उसी से
पीठ कर -
ओट में खड़े ये हो रहे हैं !!

सवाल

सवाल यह नहीं है
कि -
क्या मिला है मुझे, तुमसे !
सवाल यह है
कि -
मैंने, क्या दिया है तुम्हें ?

सवाल -
उत्तर का भी नहीं है
सवाल है -
सोचने
समझने
महसूस करने
और मनन करने का !

यदि आज भी हम, निरुत्तर रहे
तो फिर हम
खोये रहेंगे, उलझे रहेंगे
इन्हीं
छोटे-मोटे सवालों में
कि -
क्या दिया तुमने मुझे
और क्या दिया मैंने तुम्हें !!

प्रेम

जी ने, तो न चाहा था कभी
आज खुद-ब-खुद सवेरा हो गया
भोर की किरणों में -
मेरा वसेरा हो गया
रात तो सोये थे समय पर ही 'उदय'
नींद का खुलना बहाना हो गया
प्रेम होना था सुबह से हमें
नींद खुलते ही हमें वो हो गया !!

कहाँ हूँ, कहाँ नहीं हूँ मैं !

कुछ हौसले
कुछ ख्याल
कुछ मंजिलें
टटोल के देख ज़रा
कहाँ हूँ, कहाँ नहीं हूँ मैं !
आज, इन हालात में
गर तुम
आके मिल लोगे मुझसे
तो तुम्हारा
क्या चला जाएगा ?
आखिर
जो कुछ भी है
तुम्हारे पास
सब
मेरा दिया हुआ ही तो है !!

Friday, November 11, 2011

बटुआ ... 'सांई महिमा' अपरम्पार है !

'सांई दरवार' में बिखरे पड़े कागज़ के तुकडे, फूल के पत्ते, पंखुड़ियां, अगरबत्ती, इत्यादि के रेपर को सेवा भाव से समेटते समय अनिल को वहीं पडा हुआ एक 'बटुआ' मिला, 'बटुआ' को देखकर अनिल अचंभित हुआ, उसने उसे जेब में रख लिया तथा परिसर की सफाई में लग गया, फैले समस्त कचड़े को उठा उठा कर उसने ले जाकर डस्टबिन में डाल दिया !

फुर्सत होते ही उसने जेब से 'बटुआ' निकाल खोलकर देखा उसमें एक-एक हजार के ढेर सारे नोटों की भरमार थी, सांथ ही कुछ छोटे छोटे नोटों के सांथ कुछ महत्वपूर्ण कार्ड व कागज़ भी रखे थे उन्हें देखते देखते - उसकी नजर एक पर्ची पर गई जिसमें पता लिखा था तथा यह भी लिखा था कि यदि जाने-अनजाने किसी को यह पर्श मिले तो कृपया नीचे लिखे पते पर संपर्क करे !

लिखे पते को पढ़कर अनिल यह तो समझ गया था कि यह 'बटुआ' उन्हीं सज्जन का है किन्तु दिमाग में उथल-पुथल इस बात को लेकर हुई कि वह पता वहां से कोसो दूर था और उसके पास वहां जाने के लिए जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी किन्तु उसने 'सांई बाबा' के चरणों में सिर झुका कर आशीर्वाद लिया तथा 'बटुआ' में रखे रुपयों की मदद से टिकिट ले ले कर वह उस सज्जन के पास पहुँच गया !

उक्त सज्जन को 'बटुआ' सौंपते हुए अनिल ने सारा किस्सा सुनाया, किस्सा सुनकर महाशय की आँखे फटी-की-फटी रह गईं, अनिल की उम्र महज सत्रह साल थी जिसकी नेक-नियती ने महाशय को अपना भक्त बना दिया ... अजब संयोग देखिये अनिल अनाथ था तथा 'सांई मंदिर' में ही सेवा कर जीवन यापन कर रहा था और दूसरी ओर जिनका 'बटुआ' उसे मिला, वह मुंबई के जाने-मानें हीरों के व्यापारी थे जो बेऔलाद थे !

कहने को तो महज एक 'बटुआ' था किन्तु किसी चमत्कार से कम नहीं था उसमें रखे नोट दोनों के लिए महत्व नहीं रखते थे क्योंकि सेठ जी तो अपने आप में सेठ थे तथा अनिल, वह तो 'सांई भक्ति' में लीन था उसे भी उन रुपयों की कोई दरकार नहीं थी ... किन्तु इस संयोग से अरवपति सेठ को बेटा और एक अनाथ को बाप मिल गया तथा इसे 'सांई महिमा' समझ दोनों एक-दूसरे की सेवा में लग गए !!

एक सिक्के के दो पहलु : जायज-नाजायज !

एक पहलु ...
---------
जिनसे मुझे कुछ, या यूँ कहूँ
कोई उम्मीद होती है
तब
मैं खुद-ब-खुद -
वहां पहुँच जाता हूँ !

वहां पहुच कर -
मैं यह भी नहीं देखता
कि -
मेरा आना -
जायज है या नहीं !

जहां उम्मीदें अपनी हों
वहां क्या जायज -
और क्या नाजायज !!

दूसरा पहलु ...
-----------
जिनसे मुझे, या यूँ कहूँ
कुछ उम्मीदें हैं
उनके पास मुझे, खुद-ब-खुद
पहुँच जाना चाहिए !

वहां पहुच कर
मुझे यह भी नहीं देखना चाहिए
कि -
मेरा आना, जायज है या नहीं !
जहां, उम्मीदें अपनी हों
वहां -
क्या जायज, क्या नाजायज ?

पर, मेरे ख्याल
मेरे ही जीवन में -
हकीकत रूप नहीं ले पाते हैं
क्यूँ, क्योंकि -
मैं, खुद के सामने, कभी भी
नाजायज को, जायज नहीं ठहरा पाता हूँ !!

जीवन धारा

अब तो
जिस दिन तुम, कह दोगे
खुद को मेरा !
तब ही हम
खुद को अपना कह पाएंगे !
वरना
इस बहती जीवन धारा में
हम खुद को
संग संग तेरे
पीछे पीछे बहता पाएंगे !!

ग़मों का हमसफ़र

न जाने क्यूं
किसी ने खुद को
ग़मों का -
हमसफ़र बना रक्खा है 'उदय'
कोई समझाए उसे
जिंदगी का दौर
ग़मों के -
इस पार भी है
ग़मों के उस पार भी है !!

खामोश मुहब्बत ...

कालेज में बीए अंतिम वर्ष के बाद विदाई समारोह के दौरान ...

निधी - राम हम तीन वर्ष एक सांथ पढ़कर निकल रहे हैं, आज कालेज का अंतिम दिन है शायद कल के बाद हमारी मुलाक़ात हो, या ना भी हो, यह हम नहीं जानते हैं !
राम - हाँ, सच कहा तुमने निधी ... पर शायद मुलाक़ात संभव भी हो क्योंकि दुनिया गोल है !

निधी - राम हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं ... शायद दोस्ती के दौरान मुझे तुम ... मुझे तुमसे प्यार भी हो गया है किन्तु मैंने कभी तुमसे कहा नहीं, आज हिम्मत कर कह रही हूँ यदि तुम्हारी हाँ हो तो हम एक सांथ जीवन भी गुजार सकते हैं !
राम - हाँ एक-दो बार मुझे एहसास हुआ है कि तुम मुझे चाहने लगी हो किन्तु ... किन्तु मैं अनदेखी करता रहा ... वजह भी तुम जानती हो, मेरे लिए पढ़ाई कितनी जरुरी थी !

निधी - पर अब पढ़ाई पूरी हो चुकी है, मेरी दिली इच्छा है कि मैं जीवन भर के लिए तुम्हारी हो जाऊं !
राम - मैं जानता हूँ मुझे तुमसे अच्छी लड़की नहीं मिल सकती, और शायद सारे जहां में कोई दूसरी लड़की तुम जैसी होगी भी नहीं ... पर शादी करना मुमकिन नहीं है !

निधी - हाँ, मैं जानती हूँ तुम्हारी पारिवारिक परिस्थितियों को तथा तुम्हारे दायित्वों को ... फिर भी अगर तुम चाहो तो हम दोनों सांथ मिलकर ...
राम - निधी, शायद मुमकिन नहीं है !

निधी - ठीक है, मैं समझती हूँ, ... मेरी शादी कब होगी यह तो मैं नहीं जानती, पर ... शादी के फेरे पड़ने के पहले तक मुझे तुम्हारा इंतज़ार रहेगा ... जैसे ही हालात बदलें तुम निसंकोच चले आना !
राम - 'रब' जानता है क्या होगा, क्या नहीं ... फिलहाल तो मैं कुछ नहीं कह सकता !

निधी - राम, क्या हम विदा होने के पहले एक बार गले लग सकते हैं ?
राम - आज नहीं, 'रब' ने चाहा तो हम जरुर गले लगेंगे ...
( दोनों एक-दूसरे को कुछ देर देखते रहे ... तथा अगले पल ... दोनों एक-दूसरे को नम आँखों से शुभकामनाएं देते हुए विदा हो गए ... )

Thursday, November 10, 2011

इंटरव्यू ...

गाँव का युवक - राम कड़ी मेहनत लगन से पीएससी की लिखित परीक्षा पास कर इंटरव्यू में पहुंचा ...

अधिकारी - ( राम की फ़ाइल देखते हुए ) पढ़ाई के अलावा आपका और क्या क्या शौक है ?
राम - सर, क्रिकेट खेलना !

अधिकारी - अच्छा, बहुत अच्छा, ये बताओ वर्त्तमान में क्रिकेट कितने फारमेट में खेला जा रहा है ?
राम - सर, टेस्ट, वंडे तथा ट्वेंटी-ट्वेंटी !

अधिकारी - वंडे में किस खिलाड़ी ने एक ओवर में : छक्के का रिकार्ड बनाया है ?
राम - सर, नहीं जानता !

अधिकारी - गुड, ट्वेंटी-ट्वेंटी में किस खिलाड़ी के नाम एक ओवर में : छक्के मारने का रिकार्ड दर्ज है ?
राम - सर, नहीं जानता !

अधिकारी - ओह हो, अच्छा ठीक है आप जा सकते हो !
राम - सर, क्षमा सहित कुछ बोलना चाहता हूँ !

अधिकारी - हाँ, बताएं क्या कहना चाहते हैं !
राम - ( राम अपने हाँथ में रखी फ़ाइल से दो सर्टिफिकेट निकाल कर देते हुए ) सर, मैं गाँव के एक साधारण गरीब परिवार का लड़का हूँ, मेरे घर पर तो टेलीविजन है और ही समाचार पत्र-पत्रिका जैसी सुविधा वहन करने की क्षमता है इसलिए आपके दोनों सवालों के जवाब मेरे लिए कठिन थे ... किन्तु ये जो दो सर्टिफिकेट अभी आपको दिए हैं वह मेरे हैं जो पिछले दो माह के दौरान आयोजित संभाग स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता के दौरान मुझे प्राप्त हुए हैं ... पहला सर्टिफिकेट - ट्वेंटी-ट्वेंटी फारमेट में मेरे द्वारा मारे गए एक ओवर में : छक्के के परिणाम स्वरूप मिले "मैन आफ मैच" पुरूस्कार का है ... तथा दूसरा सर्टिफिकेट - वंडे फारमेट में एक ही ओवर में मेरे द्वारा मारे गए : छक्कों के परिणाम स्वरूप मिले "मैन आफ मैच" पुरूस्कार का है !

अधिकारी - ( अपनी चेयर से उठकर राम से हाँथ मिलाते हुए ) वेल, वेलडन ... यू आर सिलेक्टेड राम, मुझे तुम पर गर्व है, बधाई शुभकामनाएं !!

छुअन ...

एक दिन
छूने से उसके
दिल ने मेरे
अलग राग ही छेड़ दिया !
उस दिन से रहा नहीं -
ये दिल अपना
तब से
हमने खुद को
अपना कहना छोड़ दिया !!

जगहंसाई का शौक

एक बड़े अफसर हैं, बहुत बड़े !
प्रदेश के एक विभाग के जिम्मेदार अफसर हैं
हाँ भई, कप्तान हैं
वो भी पुलिस जैसे महत्वपूर्ण विभाग के
जी हाँ
पुलिस विभाग के ही, जिले के कप्तान हैं !

पर, सुनते हैं उन्हें जगहंसाई -
जी हाँ, जगहंसाई की आदत है
समय समय पर
वे कुछ न कुछ ऐंसे निर्णय -
लेते हैं, ले ही लेते हैं
जिससे, उनकी जगहंसाई, खुद-ब-खुद हो जाती है !

अब क्या कहें, क्या न कहें, एक बार -
उन्होंने जगहंसाई की एक नई मिशाल पेश कर दी
आश्चर्यजनक, किन्तु सत्य ...
हुआ दरअसल यह कि -
उनके प्रदेश में, सिर्फ उनके प्रदेश में ही नहीं
वरन देश के चार-छ: प्रदेशों में भी
विधानसभा चुनावों की तैयारी, जोर-शोर से चल रही थी
बस चुनाव तिथि की घोषणा होनी शेष थी
अब शेष बोले तो, चुनाव आयोग की तरफ से हरी झंडी !

रोज, हर रोज, टीव्ही चैनल्स, न्यूज पेपर्स में
चर्चा-परिचर्चा जोरों पे थी
और लो हो गई घोषित - चुनाव की डेट
चुनाव आचार संहिता लागू -
सारे के सारे अधिकार, सभी विभागों के -
हस्तांतरित हो गए, चुनाव आयोग के पास !

भाई साहब, इसमें नया क्या है ?
होता है, यही होता है
हरेक चुनाव में, सब जानते हैं !
जी हाँ जनाब, बिलकुल यही होता है, सब जानते भी हैं
कोई नई बात नहीं है
अगर कोई नई बात है तो वो ये है
कि -
कप्तान साहब ने खुद-ब-खुद, खुद की जगहंसाई करवा ली
पूछो, वो कैसे ?

हुआ दरअसल यह कि -
उनके जिले में चार-पांच थाने -
थानेदारों की पोस्टिंग के लिए खाली पड़े थे
और उनके पास -
दस-ग्यारह थानेदार भी सामने लाइन में खड़े थे
पर, सुनते हैं कि - कप्तान साहब ने
पोस्टिंग की सूची तो बनाकर
अपनी जेब में रख ली थी
और रखकर सप्ताह भर तक इधर-उधर घूमते भी रहे थे
पर ... पर क्या ?

कप्तान साहब ने दस्तखत नहीं किये थे
सूची उनकी जेब में धरी की धरी रह गई
धरी इसलिए रह गई कि -
अब सारे अधिकार कप्तान साहब से छिन कर
चुनाव आयोग के पास चले गए !
और कप्तान साहब, खुद-ब-खुद, खुद का मुंह तकते रह गए !

ये तो कप्तान साहब की जगहंसाई का -
एक मामूली-सा किस्सा है
असली जगहंसाई तो, इसी किस्से में छिपी है यारो
जो अपने आप में, जगहंसाई का एक बेजोड़ नमूना है
वो नमूना -
इनके जिले के इकलौते महिला थाने में -
थानेदार की पोस्टिंग का है ... उफ़ ! क्या कहें !!

ऐंसा नहीं था कि खाली पड़े महिला थाने में
पोस्टिंग के लिए महिला थानेदार नहीं थे
थे, तीन-चार महिला थानेदार भी थे
किन्तु, परन्तु, अब क्या कहें ...
कप्तान साहब को जगहंसाई की आदत जो पडी थी
कैसे आ जाते बाज, पैदाइसी आदत से ...
इसलिए साहब ने - वहां भी किसी की पोस्टिंग नहीं की !

और जब पोस्टिंग हुई, चुनाव आयोग से
तो महिला थाने में, पुरुष थानेदार की हुई
सुनते हैं, वो भी, कप्तान साहब की मेहरवानी से !
दुखद, किन्तु आश्चर्यजनक ...
कप्तान साहब की जगहंसाई की आदत की कीमत
बुजुर्ग, रिटायरमेंट के कगार पे खड़े
एक पुरुष थानेदार को पोस्टिंग से चुकानी पडी !

जब पत्रकारों ने कप्तान साहब से पूंछा -
तो वे हंस कर सवाल को टाल गए
और मुस्कुराते-मुस्कुराते वहां से चले गए
पत्रकार भी अचंभित हुए, और बोले -
कैसा कप्तान है यार ?
वहीं पे खड़े एक थानेदार ने कहा -
जाने दो यारो ...
कप्तान साहब को जगहंसाई का पैदाइसी शौक है !!

आजादी की दरकार

पुरुष धरा
तो औरत आकाश है
पुरुष नदी
तो औरत सागर है
पुरुष पवन
तो औरत संसार है
पुरुष फूल
तो औरत श्रृंगार है
चंहू ओर
औरत ही औरत है
फिर भी
न जाने क्यूं उसे -
आजादी की दरकार है !!

अस्तित्व

तुम क्यूँ बता रहे हो
कि -
देर से आओगे
तुम्हारा जब जी चाहे, चले आना
घर है तुम्हारा
किसने रोका है, तुम्हें
कौन रोक सकता है तुम्हें !

तुम हमेशा से
अपनी मर्जी के मालिक रहे हो
आज भी हो
जब चाहे तुम्हारी मर्जी -
आते हो
और जब चाहे, चले जाते हो !

उफ़ ! मैं कौन हूँ !!
शायद -
बिस्तर से जियादा कुछ भी नहीं !
तुम आने पर
मुझे झटकारना भी नहीं चाहते
सीधे आकर गिर पड़ते हो
और, सो जाते हो !

भले चाहे समाज मुझे -
तुम्हारी धर्मपत्नी समझता है
और भले चाहे धर्म मुझे -
तुम्हारी अर्धांग्नी मानता है
पर, मैं जानती हूँ
मेरा अस्तित्व -
बिस्तर से जियादा कुछ भी नहीं है !!

यात्राएं बनाम कुर्सी यात्रा

जन्म से लेकर, अब तक
पद,
बैलगाड़ी,
साईकल,
मोटर,
रेल,
हवाई जहाज
सब की सब यात्राएं की हैं हमने !

और तो और
समय समय पर, जब जब मौक़ा मिला
सदभावना
स्वाभिमान
जन चेतना
जैसी महत्वपूर्ण यात्राओं में भी -
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पे शरीक रहा हूँ !

काश ! हमने
एक-दो सामाजिक व जन कल्याणकारी -
यात्राएं भी कर ली होतीं
उफ़ ! मर जायेंगे तब ...
शायद ! हम ही हमारी
अंतिम यात्रा - शव यात्रा में
शरीक न हो पायें !

वजह ...
शायद ! उस समय भी हमारी आत्मा
"कुर्सी यात्रा" के मोह में
राजधानी की गलियों, चौक-चौराहों पर
किसी न किसी कुर्सी के -
सच ! इर्द-गिर्द भटकती रहे !!

पीठ की सर्जरी

एक नेता अफसर से -
और वही बात, अफसर नेता से
सीना तान के -
आपस में शान से कह रहे थे !

यारो अपुन ने भी -
पीठ की सर्जरी करवाई है
एक 'चाबी' और एक 'पर्ची' -
पीठ पे 'फिट' करवा के फुर्सत पाई है !

चाबी 'तिजोरी' की है
और पर्ची में -
स्वीस बैंक का 'कोड' लिखा है !

अब मर भी जाएं -
तो क्या फर्क पड़ता है
सारा खजाना और धन-दौलत तो अपुन -
पीठ पे बाँध के चलता है !!