नया सवेरा

‘उदय’ कहता है मत पूछो, क्या आलम है बस्ती का / हर किसी का अपना जहां, अपना-अपना आसमां है !

Tuesday, April 26, 2011

... सवालों के कटघरे !


Posted by नया सवेरा at 11:22 PM
Email ThisBlogThis!Share to XShare to FacebookShare to Pinterest
Labels: प्रिंट मीडिया में मेरी कलम

No comments:

Post a Comment

Newer Post Older Post Home
Subscribe to: Post Comments (Atom)
My photo
नया सवेरा
View my complete profile
..... !! श्याम कोरी 'उदय' !! .....

जन्म - १९६९
स्थान - ग्राम - उदयपुर, तहसील - गंज बासौदा, जिला - विदिशा
( मध्यप्रदेश )
शिक्षा - बी. कॉम.
( पं रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ )
भाषा - हिन्दी, अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, बुन्देलखंडी
लेखन - कविता, कहानी, लघुकथा, हास्य-व्यंग्य, शेर व समसामयिक मुद्दों पर स्वतंत्र लेखन
खेल - शतरंज, बेडमिन्टन, क्रिकेट
संपर्क - 9300957752
shyamkoriuday@gmail.com

Blog Archive

  • ▼  2011 (460)
    • ►  November (51)
    • ►  October (90)
    • ►  September (42)
    • ►  August (23)
    • ►  July (63)
    • ►  June (23)
    • ►  May (9)
    • ▼  April (48)
      • आँखें !
      • चाहत !
      • दुपट्टा !
      • ख़्वाबों की ओर !
      • जय जय जय !
      • ... सवालों के कटघरे !
      • पत्रकार और साहित्यकार !
      • जन लोकपाल बिल : सवालों के कटघरे !
      • राजा-रानी !
      • ... जन लोकपाल बिल !
      • सांथी
      • सपने
      • ख़्वाब !
      • ... बुर्के पर प्रतिबन्ध !
      • ... सांठ-गांठ की नीति !
      • न्यायपालिका और जन लोकपाल !
      • अन्ना हजारे !
      • तुम क्या हो !
      • खामोशी !!
      • फ्रांस में बुर्के पर प्रतिबन्ध जल्दबाजी का फैसला !
      • भ्रष्टाचार !
      • अंधकार !
      • ताप !
      • शोर !
      • "ज्वलनशील बाबाओं" से आहत होते "ऊर्जावान बाबा"
      • एक सबक : पटकनी !
      • ... पुरुष देख के खुश, तो महिला दिखा के खुश !
      • लालची बुढडा !
      • मर्जी के मालिक !
      • खजाना !
      • दानवीर सेठ !
      • भ्रष्टाचार का बोलबाला !
      • मुफ़्त की नसीहते !
      • भ्रष्टाचार : त्राहिमाम त्राहिमाम !
      • जन लोकपाल बिल !
      • दुर्भावनाओं से ग्रसित नामी-गिरामी कलमकार !
      • जन लोकपाल बिल : भ्रांतियों का दुष्प्रचार !
      • सूतम-सूत !!
      • पतझड़ !
      • सच ! जिन्दगी, उदास है मेरी !!
      • उड़ान !
      • दस्तूर !
      • गर्म रातें !!
      • तन्हाई !
      • क्रिकेट ! आज हम विश्व विजेता हैं !!
      • शब्द - निशब्द !
      • स्पर्श !
      • अंकुरित !!
    • ►  March (16)
    • ►  February (29)
    • ►  January (66)
  • ►  2010 (23)
    • ►  December (17)
    • ►  November (6)

Labels

  • कविता (351)
  • नक्सलवाद (4)
  • प्रिंट मीडिया में मेरी कलम (7)
  • मनन - चिंतन (7)
  • लघुकथा-कहानी-हास्य-व्यंग्य (62)
  • विविध (1)
  • शेर (46)
  • समसामयिक (21)

Popular (Last 7 days)

  • बेचैनी
    कुछ अजब कुछ गजब सन्नाटा सा था चंद रातें कभी सोतीं कभी जागतीं खुली आँखों से कभी कभी मूंदकर आँखें मैं देखता सा था ! क्या था क्यों था...
  • कफ़न का टुकड़ा !
    गर नहीं लड़ा मैं आज भयंकर तूफानों से कल छोटी फूंको से भी मैं गिर सकता हूँ ! है कद - काठी मेरी , आज भले छोटी ही सही पर...
  • अचरज !
    तुम करते रहो अचरज मुझे समझने और समझाने में भूलने, याद करने में सच ! मैं कुछ भी तो नहीं हूँ सिवाय एक अक्स के तेरे कभी तू डूब जाता है...
  • हवस
    हवस की आग से चाहे जैसे भी हो, तुम बाहर निकल आओ कहीं ऐंसा न हो कि - खुद ही - जल के ख़ाक हो जाओ !
  • जन्मसिद्ध अधिकार !
    कोई कुछ भी कहे कहता रहे हम भ्रष्ट हैं तो हैं और आगे भी रहेंगे पर हम किसी के कहने से चीखने-चिल्लाने से भ्रष्टाचार नहीं छोड़ेंगे ! भ्रष...
  • अमिताभ बच्चन को कोई कुछ नहीं कहता ...
    अमिताभ बच्चन जैसी शख्सियत जब कंप्यूटर को - "कंप्यूटर जी" कह के बुलाते हैं तब कोई बात नहीं होती और, उन्हें कोई कुछ नहीं कहता ! ...
  • मतदान के लिए !
    गरीब, मजदूर, किसान का होना , बने रहना , बेहद जरुरी है गर ये नहीं रहेंगे , तो , शायद हम , हमारी सियासतें , भी न रहें हमें , अपने ...
  • यारों से, रकीबों के रिवाज अच्छे हैं !
    पैसा बडा है, ईमान बदल दे पर इतना भी नहीं, कुदरत को बदल दे ! ..... नही है खौफ बस्ती में, तेरी खुबसूरती का खौफ है तो, तेरी कातिल अदाएँ हैं...
  • बेजान कमरा !
    हे यमदूतो, मेरी प्रार्थना सुनकर तुम, चुप-चाप, चले आओ मुझे, तुम्हारा इंतज़ार है इस ऊंची हवेली के पीछे बने, बेजान कमरे में मैं, ज़िंदा हूँ ...
  • साहित्यकार
    सरकार, कितनी अच्छी सरकार जो दे रही है भत्ता बेरोजगारों को / कर रही है माफ़ ऋण किसानों के / दे रही है पेंशन सांसदों - विधायकों को / और तो...

Popular (All time)

  • बेचैनी
    कुछ अजब कुछ गजब सन्नाटा सा था चंद रातें कभी सोतीं कभी जागतीं खुली आँखों से कभी कभी मूंदकर आँखें मैं देखता सा था ! क्या था क्यों था...
  • होली !
    होली आई , आई होली लेकर आई , खुशियां होली रंग - गुलाल , छेड - छाड गली - चौबारे , घर - आंगन गुजिया - सलोनी , लडडू - पेडे मौज - मस्ती...
  • गुरु की महिमा
    सत्य के पथ पर चलते चलते मिलते कुछ अंधियारे हैं ! सांथ गुरु की कृपा हो तब हो जाते उजियारे हैं ... गुरु की महिमा गुरु ही जाने भक्त तो...
  • चमचागिरी और चापलूसी !
    एक दिन मैं भी, घंटों बैठकर एकांत में, सोचता रहा चमचागिरी और चापलूसी में आखिर, बुराई क्या है लोग क्यों बुरी नजर से, देखते हैं किसी चम...
  • कंजूस खोपडी !
    एक दिन ट्रैन में यात्रा के दौरान सामने वाली सीट पर एक महाशय को सूट-बूट मे आस-पास बैठे यात्रियों के साथ टाईमपास करते देखा, वह देखने से धनव...
  • हवस
    हवस की आग से चाहे जैसे भी हो, तुम बाहर निकल आओ कहीं ऐंसा न हो कि - खुद ही - जल के ख़ाक हो जाओ !
  • 'सत्य-अहिंसा' के पथ पर
    चलो लड़ लें किसी न किसी से , आज लड़ ही लें किसी न किसी से ही क्यों किसी से भी लड़ लें जब लड़ना ही है , तब सोचना...
  • कफ़न का टुकड़ा !
    गर नहीं लड़ा मैं आज भयंकर तूफानों से कल छोटी फूंको से भी मैं गिर सकता हूँ ! है कद - काठी मेरी , आज भले छोटी ही सही पर...
  • मंहगाई, सरकार, जनसंसद ... जय हो !
    मंहगाई, उफ़ ! जानलेवा मंहगाई अभी अभी, कुछ देर पहले मैं सोच रहा था, सोच रहा हूँ सच ! सोचने के लिए मजबूर हूँ !! कि - यदि, इसी तरह पेट्रोल...
  • सफ़लता का मूल मंत्र !
    आज मानव जीवन बेहद तेज गति से चलायमान है , प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ़ अपने आप में मशगूल है, उसके आस - पास क...
Watermark theme. Powered by Blogger.