Showing posts with label नक्सलवाद. Show all posts
Showing posts with label नक्सलवाद. Show all posts

Friday, September 30, 2011

नक्सलवाद, सरकार ... जय हो !!

गर सरकार, सरकारें
चाहती हैं
कि -
नक्सलवाद, नक्सली समस्या
ख़त्म हो
तो होनी ही चाहिए !

पर, कैसे
क्या समाधान की दिशा में
कोई सार्थक
पहल, उपाय हो रहा है
शायद ! नहीं !!

यदि सरकारें
खुद ही, नहीं चाहतीं
समाधान
तब, फिर, नक्सलवाद
अपने आप में
कोई समस्या ही नहीं है !

और जब समस्या नहीं है
तो समझो नहीं है
गर होती समस्या
तो निश्चित ही, कोई न कोई
चिंतित जरुर होता !

जब कोई चिंतित नहीं
मतलब
नक्सलवाद ...
कोई समस्या नहीं
नक्सलवाद, सरकार ... जय हो !!

Thursday, September 15, 2011

क्या नक्सलवाद एक समस्या है !

क्या नक्सलवाद एक समस्या है !
जी हाँ
जी नहीं
हाँ, है तो, पर वैसी नहीं है
जैसी
अन्य समस्याएं होती हैं
तो फिर कैसी है !

ये समस्या तो है
पर समस्या नहीं है
गर होती समस्या, तो समाधान भी होता
या निकाला जाता
या निकालने का प्रयास किया जाता
मतलब
समस्या है, पर वैसी नहीं है
जिसका समाधान निकाला ही जाए !

इसलिए, इसलिए तो
चल रहा है
धक् रहा है
कोई गंभीर, अति-गंभीर नहीं है !
होना भी नहीं चाहिए
जब समस्या नहीं
गंभीर नहीं
तो फिर किस बात की गंभीरता !
गंभीरता नहीं
तो फिर, समाधान, क्यों, किसलिए !!
कहीं ऐसा तो नहीं, नक्सलवाद ... समस्या ही ... !!!

Thursday, February 10, 2011

नक्सली समस्या !

नक्सली, कौन है नक्सली /
नक्सली समस्या आखिर क्या है /
और कौन है इसके जन्मदाता
और कौन चाहते है इसकी रोकथाम /
रोकथाम के लिए कौन काम कर रहा है /
नक्सली उन्मूलन के लिए कौन दम भर रहा है /
क्या मात्र दम भरने से उन्मूलन हो जायगा /
या बरसों से दम भर रहे लोगो के साथ /
कुछेको का नाम और जुड़ जायगा
नकसली उन्मूलन के लिए उठाए गए कदम /
क्या कारगर नहीं थे /
कारगर थे तो फिर उन्मूलन क्यों न हुआ /
क्यों कदम उठ -उठ कर लड़खडा गए ,
दम भरने वाले कमजोर थे /
या उठाए गये कदम /
या फिर हौसला ही कमजोर था
समय-समय पर नए-नए उपाय /
और फिर वही ठंडा बस्ता /
आखिर उपायों के कब तक ठंडे बसते बनते रहेंगे /
कब तक माथे पर चिंता की लकीरें पड़ती रहेंगी /
कब तक नक्सलियों के हौसले बड़ते रहेंगे
कब तक भोले भाले लालसलाम कहते रहेंगे /
लालसलाम -लालसलाम के नारे कब तक गूंजते रहेंगे
एयर कंडीशन कमरों -गाड़ियों में बैठने वाले /
एयरकंडीशन उड़न खटोलो में उड़ने वाले /
क्या नक्सली समस्या का समाधान खोज पाएंगे /
क्या लाल सलाम को बाय-बाय कह पाएंगे
एयरकंडीशन में रचते बसते लोग ,
तपती धरती की समस्या को समझ पाएंगे /
सीधी- सादी सड़कों पर दौड़ते लोग /
उबड खाबड़ पग डंडियों पर चलने के रास्ते बना पाएंगे /
सरसराहट से सहम जाने वाले लोग /
क्या नक्सली खौफ को मिटा पाएंगे /
या फिर नक्सली उन्मूलन का दम ......
क्या हम नक्सली समस्या समझ गए है /
क्या हम इसके समाधानों तक पहुँच गए है /
क्या हम सही उपाय कर पा रहे है /
शायद नहीं .......................आख़िर क्यों ?
क्योकि तपती धरती , ऊबड खाबड़ पग डंडियों /
में रचने बसने वालों के सुझाव कहाँ है /
कौन सुन -समझ रहा है उनकी ,
कौन आगे है -कौन पीछे है /
एयर कंडीशन ...................तपती धरती /
................और नक्सली समस्या ?
साथ ही साथ यह प्रशन उठता है /
की नक्सली चाहते क्या है ,
क्या वे लक्ष्य के अनुरूप काम कर रहे हैं /
या फिर सिर्फ मार- काट ............... /
........लूटपाट.......बारुदी सुरंगें /
ही नक्सलियों का मकसद है !!

Friday, December 10, 2010

नक्सली उन्मूलन की दिशा में शांतिवार्ता का मार्ग कितना उचित !

यह न सिर्फ खेद का वरन शर्म का भी विषय है कि आज भी एक वर्ग नक्सलवाद को विचारधारा मानते हुए नक्सली कमांडर आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत को ह्त्या मान कर चल रहा है, सचमुच यह एक सच्चा लोकतंत्र है जहां इस तरह की भावनाएं व विचारधाराएं फल-फूल रही हैं ।

नक्सली कमांडर आजाद की मौत को ह्त्या मानने का सीधा-सीधा तात्पर्य पुलिस को हत्यारा घोषित करना है जब एक बुद्धिजीवी वर्ग इसे ह्त्या मान सकता है तो कल उसे शहीद की पदवी से भी नवाजा जाएगा ... धन्य है लोकतंत्र की माया जहां कुछ भी संभव है ।

मैं यह नहीं कहता कि शान्ति वार्ता का मार्ग अनुचित व अव्यवहारिक है पर यह जरुर कहूंगा कि जो लोग शान्ति वार्ता के पक्षधर हैं उन्हें क्या अपने आप पर पूर्ण विश्वास है कि उनके एक इशारे पर नक्सली हथियार छोड़ देंगे, यदि ऐसा है तो शान्ति वार्ता का प्रस्ताव उचित है अन्यथा सब बेकार है ।

मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना तो यह है कि जमीन व जंगल में सक्रीय नक्सली, शान्ति वार्ता की पहल कर रहे बुद्धिजीवियों के नियंत्रण से बहुत बाहर हैं यदि ऐसा नहीं है तो वे एक बार आजमा कर देख लें, कहीं ऐसा न हो कि शान्ति वार्ता का कोई सकारात्मक नतीजा निकल आये और नक्सली अपनी मनमानी करते हुए फैसले को मानने से साफ़ तौर पर इंकार कर दें ... ज़रा सोचो उस समय क्या होगा !!

नक्सलवाद, नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ जन आन्दोलन नहीं रहा वरन एक नक्सली समस्या बन गया है ... यदि आज कोई यह कहे कि नक्सलवाद शोषण व अन्याय के विरुद्ध आवाज है, विकास के लिए उठाया हुआ कदम है, एक जन आन्दोलन है तो सब बेईमानी है।

एक बात और उभर कर चल रही है वो है माओवाद, नक्सलवाद को माओवाद की संज्ञा से क्यों पारितोषित किया जा रहा है, नक्सलवाद और माओवाद में जमीन - आसमान का फर्क है दोनों के मूलभूत सिद्धांतों व उद्देश्यों की व्यवहारिकता में कोई मेल नहीं है और न ही हो सकता है ।

नक्सलवाद एक समस्या है इसके समाधान के लिए शांतिवार्ता का मार्ग भी अपनाया जा सकता है पर शांतिवार्ता के लिए भी कुछ समय सीमा तय किया जाना बेहतर होगा अन्यथा समय बर्बाद करने से ज्यादा कुछ नहीं जान पड़ता ... बेहतर तो ये होगा कि नक्सली उन्मूलन के लिए एक ठोस व कारगर रणनीति तैयार की जाए तथा नक्सलियों का राम नाम सत्य किया जाए ।
( नोट :- यह लेख दिनांक - १९ सितम्बर २०१० को लेखबद्ध किया गया था विलम्ब से यहाँ प्रकाशित है )