Showing posts with label समसामयिक. Show all posts
Showing posts with label समसामयिक. Show all posts

Monday, October 10, 2011

जगजीत सिंह ... हार्दिक श्रद्धांजलि ...

जगजीत सिंह की याद में ...

हार्दिक श्रद्धांजलि ...
उनकी ओर से कुछ पंक्तियाँ ... जो मेरे जेहन में उमड़ पडीं ...

सहेज पाना, नहीं अब मुमकिन
तुम्हारी यादें, यहीं
छोड़ जा रहा हूँ !

था ये कैंसा, कारवां जिंदगी का
जिसे छोड़ पीछे, मैं चला जा रहा हूँ !

कभी याद आऊँ, गुनगुना लेना मुझको
गीत सारे, यहीं छोड़ जा रहा हूँ !

Tuesday, September 6, 2011

एक चिटठी अन्ना हजारे के नाम ...

अन्ना जी, अरविंद जी
जय हिंद
१ - "राईट टू रिजेक्ट" के सांथ सांथ आपके एजेंडे में एक सुझाव और शामिल करने हेतु आग्रह है -
"एक व्यक्ति एक स्थान से ही चुनाव लड़ सके ! अक्सर देखा गया है कि कुछेक प्रत्याशी ( मंजे हुए नेता जिन्हें चुनाव हारने का भय होता है ) २-२, ३-३ चुनाव क्षेत्रों से नामांकन दाखिल कर चुनाव लड़ते हैं तथा कहीं-न-कहीं से तिकड़म कर चुनाव जीत जाते हैं ! नए प्रस्तावित प्रावधान के तहत ऐसा होना चाहिए कि - एक व्यक्ति सिर्फ एक स्थान से ही चुनाव लड़ सके, ऐसी स्थिति में खुद को बहुत बड़ा नेता समझने वाले नेताओं को वास्तविक जनाधार का सामना करना पडेगा जो लोकतंत्र के लिए सकारात्मक व हितकर होगा !"
२ - सांथ ही सांथ एक मुद्दा और - यदि कोई भी चुनाव जीता हुआ प्रत्याशी विधायक / सांसद अपने पद पर रहते हुए पुन: कोई भी आगामी या मध्यावधि चुनाव लड़ना चाहता है तब उसे अपने वर्त्तमान पद सांसद / विधायक से सर्वप्रथम 'रेजिगनेशन' देना आवश्यक कर दिया जाए, इसके पश्चात ही वह चुनाव लड़ सके ! ऐसी स्थिति में 'रेजिगनेशन' देने उपरांत उस "पर्टीकुलर सीट" पर कोई मध्यावधि चुनाव न हो, जो पिछले चुनाव में निकटतम प्रत्याशी रहा हो उसे ही आगामी निर्धारित चुनाव तक के लिए "विधिवत चुना हुआ जन प्रतिनिधी" संवैधानिक रूप से घोषित कर दिया जाए ! इस प्रस्तावित प्रक्रिया के पालन से यह होगा कि जनमत का सम्मान बना रहेगा तथा बेवजह जन्में मध्यावधि चुनाव के बोझ से सरकार व जनता दोनों बचे रहेंगे, परिणाम स्वरूप लालच में आकर कोई भी जीता हुआ प्रत्याशी जन भावनाओं के सांथ खिलवाड़ नहीं कर सकेगा!
३ - सांथ ही सांथ "राईट टू रिकाल" रूपी मुद्दा पुनर्विचार योग्य है !
उक्त मुद्दे जनहित में विचार हेतु ...
शेष कुशल !
शुभकामनाएं, जय हिंद !!

Monday, September 5, 2011

'शिक्षक दिवस'

दो मित्र शाम - ७.३० बजे अचानक मिलने पर ...
राम - अरे यार संतोष कैसा है, आज बहुत दिन बाद , बहुत खुशी हुई मिलकर, और सुना क्या नया चल रहा है !
संतोष - कुछ ख़ास नहीं, तुझे तो पता ही है कि - स्कूल में पढ़ाने लगा हूँ, उसके अलावा कुछ ट्यूशन वगैरह कर लेता हूँ, बस और कुछ नहीं, तू सुना कैसी चल रही है तेरी नौकरी ... खूब माल कमा रहा होगा !

राम - माल कमाने जैसी कोई बात नहीं है, तू तो जानता है अपुन इस लफड़े से दूर रहता हूँ, और रही नौकरी की बात - नौकर तो नौकर ही होता है, उसकी क्या मर्जी और क्या वह मर्जी का मालिक ... खैर छोड़, सुना कल की क्या तैयारी चल रही है !
संतोष - कल बोले तो ... क्या मतलब है तेरा !

राम - अरे यार ... कल 'शिक्षक दिवस' है, और तू जाने-मानें स्कूल का शिक्षक है यार ... इसलिए पूंछ लिया ... मेरा मतलब 'शिक्षक दिवस' की तैयारी से है !
संतोष - अरे यार ... तू भी ... तूने तो मुझे चौंका ही दिया था ... ठीक है 'शिक्षक' हूँ, अब इसका ये मतलब तो नहीं कि कुछ तैयारी-सैयारी करनी पड़ेगी ... अपने को क्या करना है, कुछ भी तो नहीं, जो कुछ भी करना है स्कूल मैनेजमेंट को और बच्चों को करना है ... तू भी यार !

राम - नहीं यार ... फिर भी कुछ तो ... 'शिक्षक दिवस' अपने देश का एक पूज्यनीय पर्व है और तू ओवर आल एक टीचर है आई मीन 'गुरु' है ! ... यार हम राजेन्द्र प्रसाद, राधा कृष्णन, लाल बहादुर शास्त्री, मदर टेरेसा, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, सांई बाबा, जैसे महान व एतिहासिक पुरुष नहीं बन सकते, पर क्या उनके बताये रास्ते पर भी नहीं चल सकते ... ठीक है जैसी तेरी मर्जी ... पर अपुन ने तो ये डिसाइड किया हुआ है कि - कल गरीब बस्तियों में जा-जा कर बच्चों को उनके महत्त्व की शिक्षाप्रद व ज्ञानवर्धक किताबें, चार्ट, नक़्शे, पोस्टर, स्लेट-पेन्सिल, इत्यादि बाँट - बाँट कर 'शिक्षक दिवस' मनाएंगे ... !
( कुछ देर सन्नाटा-सा पसरा रहा ... फिर राम अपने मित्र संतोष को मिलते हैं कहते हुए ... 'जय हिंद' कह कर चला गया )

Friday, September 2, 2011

राजनीति : भीड़ बनाम मुद्दे !

हमारे देश में दिन व दिन बढ़ रही आबादी हमें कहाँ लेकर जायेगी अभी यह स्पष्ट नहीं है किन्तु यह तो जान ही पड़ता है कि यह बढ़ती आबादी राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं को निसंदेह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्षतौर पर सपोर्ट कर रही है, मेरे कहने का तात्पर्य बहुत ही सीधा व सरल है कि यह बढ़ती आबादी मुद्दा विहीन राजनैतिक महात्वाकांक्षी व्यक्तित्व को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी राजनीति को हरा-भरा रखने में बेहद सहायक है अर्थात जिन राजनैतिक व्यक्तित्वों व दलों के पास सार्थक व प्रभावी मुद्दे नहीं हैं वे भी अपने छोटे-मोटे प्रयासों से भीड़ जमा करने में सफल हो जाते हैं ! अब इस भीड़ के जमा होने के पीछे कोई ठोस बजह नहीं होती सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस भीड़ के पीछे बढ़ती आबादी और बेरोजगारी एक बजह मानी जा सकती है या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आर्थिक मैनेजमेंट के आधार पर भी यह भीड़ इकट्ठा की जा रही है ! यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा कि यदि राजनैतिक व्यक्तित्वों के निकटतम नुमाइंदे भीड़ जुटाने का प्रयास जोर-शोर से न करें तो संभव है राजनैतिक व्यक्तित्वों व दलों की जगहंसाई हो जाए, यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि ऐसा मेरा व्यक्तिगत आंकलन है कि यदि भीड़ जुटाने के लिए धन व व्यक्तिगत संसाधनों का प्रयोग न हो तो भीड़ जुटा पाना बेहद कठिन होगा क्योंकि वर्त्तमान में बड़े से बड़े राजनैतिक नैतृत्व मुद्दों की नहीं वरन भीड़ की राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं !

यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि मेरा मकसद किसी भी राजनैतिक व्यक्तित्व या राजनैतिक दल को आहत करने का नहीं है वरन वर्त्तमान राजनैतिक नैतृत्व का ध्यान भीड़ बनाम मुद्दों की राजनीति की ओर आकर्षित करने का है, मैं यह भी भलीभांति जानता और महसूस करता हूँ कि वर्त्तमान राजनैतिक नैतृत्व भी यह भलीभांति जानते व समझते हैं ! इन गंभीर हालात में भी यदि राजनैतिक नैतृत्व व राजनैतिक दलों के एजेंडों में अमूल-चूल बदलाव नहीं आता है तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता का इन दलों पर से विश्वास पूर्णत: उठ जाए, आम जनता का वर्त्तमान राजनैतिक कार्य प्रणाली से दिन व दिन उठ रहा विश्वास बेहद चिंतनीय ही कहा जा सकता है ! वर्त्तमान राजनैतिक सोच व जनमानस की सोच में बढ़ रहा अविश्वास आने वाले दिनों में गंभीर राजनैतिक व सवैधानिक बदलाव को इंगित कर रहा है यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि अब समय आ गया है कि वर्त्तमान राजनैतिक नैतृत्व गंभीरतापूर्वक चिंतन व मनन कर उपयोगी कदम उठाएं !

एक ओर जहां राजनैतिक व्यक्तित्वों व राजनैतिक दलों को भीड़ जुटाने के लिए आर्थिक मैनेजमेंट का सहारा लेना पड़ता है अर्थात लोगों के घर घर तक गाडी पहुंचवा कर तथा आने-जाने के समय भीड़ की व्यक्तिगत जरूरतों का भी ख्याल रखते हैं तब कहीं जाकर उतनी भीड़ इकट्ठी हो पाती है जिससे वे जगहंसाई से बच सकें ! वहीं दूसरी ओर जन लोकपाल की मांग को लेकर अन्ना हजारे के नैतृत्व में आयोजित आन्दोलन अपने आप में एक मिसाल हैं जिनमें लोगों की भीड़ खुद-ब-खुद उमड़ रही थी, एक दिन - दो दिन नहीं वरन आन्दोलन के अंतिम पड़ाव तक लोगों का हुजूम देखते बन रहा था, इन दोनों आन्दोलनों ने - चाहे वह जंतर-मंतर का हो या रामलीला मैदान का, यह स्पष्ट कर दिया है कि लोगों की भीड़ या दूसरे शब्दों में कहें जनसैलाव किसी प्रायोजित कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था वरन एक गंभीर मुद्दे को लेकर संजीदा लोगों का स्वस्फूर्त समर्थन था, भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल रूपी क़ानून की मांग को लेकर जो जनसैलाव देखने को मिला वह निश्चित ही एक ऐतिहासिक अध्याय कहा जा सकता है ! वर्त्तमान राजनैतिक नैत्रत्वों व दलों को यह मनन व चिंतन करना ही होगा कि अब समय भीड़ की राजनीति का नहीं वरन मुद्दों की राजनीति का आ गया है तथा इस दिशा में सकारात्मक पहल ही आवश्यकता है जो न सिर्फ राजनैतिक दलों वरन लोकतंत्र के लिए भी प्रभावकारी व हितकर है !

Tuesday, August 30, 2011

'राईट टू रिजेक्ट'

लोकतांत्रिक प्रणाली की सर्वाधिक मजबूत व सशक्त व्यवस्था यदि कोई है तो निसंदेह स्वतन्त्र चुनाव प्रणाली है, स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया निश्चित ही हमारे लोकतंत्र को मजबूती प्रदाय करती है, ये और बात है कि इस मजबूत प्रणाली को भी छल, बल व प्रलोभन के आधार पर प्रभावित किया जा सकता है यह भी कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा कि जन समुदाय को छल, बल व प्रलोभन के आधार पर प्रभावित किया जाता रहा है, किया जा रहा है लेकिन फिर भी स्वतन्त्र चुनाव प्रणाली हमारे संविधान की सशक्तता की एक बेहद प्रभावशाली व बेहतरीन मिशाल है !

स्वतन्त्र चुनाव प्रणाली के माध्यम से जनता को अपने प्रतिनिधी चुनने का विशेषाधिकार प्रदाय किया गया है यह अधिकार इतना सशक्त व प्रभावी है कि समय समय पर अर्थात एक नियमित व निर्धारित अंतराल के बाद जनता स्वयं अपने लिए अपने पसंद का प्रतिनिधी चुन सकती है, सांथ ही सांथ यह भी प्रावधान है कि यदि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधी से संतुष्ट नहीं है तो वह एक निर्धारित समयावधि के बाद उन्हें स्वमेव बदल सकती है, किन्तु इस बदलाव के लिए एक निर्धारित समय सीमा का इंतज़ार करना पड़ता है जो पांच साल बाद की होती है अर्थात आगामी चुनाव में ही बदलाव संभव होता है !

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई चुना हुआ प्रतिनिधी जन भावनाओं पर खरा नहीं उतरता है तब जनता को उसे हटाने अर्थात बदल देने का अधिकार मिलता है किन्तु वह अधिकार अगले चुनाव अर्थात पांच साल बाद ही मिलता है, इन पांच सालों तक वह चुना हुआ प्रतिनिधी अपने आप में स्वतंत्र होता है यदि वह चाहे तो जन भावनाओं का आदर करे, और न चाहे तो वह जन भावनाओं को नजर अंदाज कर दे ! इन परिस्थितियों में यह चुनाव प्रणाली अपने आप में सवालिया निशान खडा कर देती है, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जब एक जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधी चुनाव जीतने के बाद खुद की मर्जी का मालिक हो जाए, दूसरे शब्दों में कहें तो 'बेलगाम घोड़ा' हो जाए तब निसंदेह वह चुना हुआ प्रतिनिधी 'लोकतंत्र रूपी बगिया' को चौपट ही करेगा !

निसंदेह इन परिस्थितियों में वह चुनाव जीता हुआ प्रतिनिधी जन भावनाओं का खुल्लम-खुल्ला मजाक उड़ायेगा, उस चुने हुए प्रतिनिधी का यह व्यवहार निश्चित ही स्वतन्त्र, निष्पक्ष व मजबूत लोकतंत्र के नजरिये से भी अहितकर होगा, यहाँ यह कहना भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि वर्त्तमान में ऐसे हालात देखने व सुनने को मिल रहे हैं ! इन विकट परिस्थितियों के बारे में, इन विकट परिस्थितियों के लिए, हमें आज से ही घोर व सशक्त विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है, यदि समय रहते विचार-विमर्श कर सार्थक कदम नहीं उठाये गए तो निसंदेह हमारा लोकतंत्र दिन-व-दिन कमजोर होगा !

इस मुद्दे के सांथ सांथ एक और मुद्दा आज-कल लोगों के जेहन में उमड़ रहा है वह मुद्दा यह है कि इस स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव प्रणाली में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि यदि चुनाव लड़ रहे सारे के सारे प्रत्यासियों में से, यदि कोई भी प्रत्यासी, मतदाता को पसंद नहीं है तब वह क्या करे अर्थात वह कौन-सा रास्ता चुने, मतदान में हिस्सा न लेने का या उपलब्ध प्रत्यासियों में से ही किसी प्रत्यासी को चुन लेने का, यहाँ पर मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि इन हालात में 'अंधों में काणे को राजा बनने' का सुअवसर मिल जाएगा तात्पर्य यह है जनता न चाहकर भी किसी न किसी के पक्ष में मतदान कर चुनाव जितवा देगी, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, ये परिस्थितियाँ निसंदेह निरंतर लोकतंत्र को कमजोर करेंगी !

लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में यह भी प्रावधान होने चाहिए कि मतदान के समय जनता अर्थात मतदाता को जब कोई भी प्रत्यासी योग्य व उचित प्रतीत न लगे तब जनता अर्थात मतदाता उस प्रत्यासी या उन प्रत्यासियों को मतदान के समय ही 'रिजेक्ट' कर दे, यहाँ पर मेरे कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि जनता के पास 'राईट टू रिजेक्ट' के रूप में संवैधानिक अधिकार होना चाहिए, मैं यहाँ यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि यह प्रावधान आने से लोकतंत्र की गरिमा धूमिल नहीं होगी वरन लोकतंत्र और भी सशक्त, प्रभावी व आकर्षक होगा, यह प्रणाली हमारे लोकतंत्र को, हमारे संविधान को, हमारे देश को दुनिया के मंच पर बेहद प्रखर व सशक्त रूप में प्रस्तुत करेगी !

मैं यह नहीं कहता कि जिन जनमानस के जेहन में यह विचार उमड़ रहे हैं उसके पीछे उनका कोई निहित स्वार्थ भी समाहित होगा, शायद कतई नहीं, मेरा तो इस मुद्दे पर व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि 'राईट टू रिजेक्ट' का प्रावधान शीघ्र-अतिशीघ्र अमल में लाना लोकतंत्र को मजबूत करेगा ! आयेदिन हम देखते हैं, महसूस करते हैं कि वर्त्तमान में जो प्रत्यासी चुनाव मैदान में होते हैं उनकी व्यवहारिक व सामाजिक छबि कितनी सकारात्मक व नकारात्मक होती है, इन हालात में न चाहते हुए, न चाहकर भी, ऐसे प्रत्यासी चुनाव जीत कर आ जाते हैं जो अपने आप में एक सवालिया निशान होते हैं, खैर यह मुद्दा बहस व चर्चा का नहीं है और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि आज अगर चर्चा होनी चाहिए तो 'राईट टू रिजेक्ट' पर होनी चाहिए क्योंकि यह वक्त की मांग है, वक्त की जरुरत है, इस मुद्दे पर मेरा व्यक्तिगत मानना है कि 'राईट टू रिजेक्ट' रूपी कदम अर्थात प्रावधान निसंदेह लोकतंत्र को मजबूत करेगा !

Monday, July 11, 2011

मुंडन संस्कार अर्थात एक साये का उठ जाना !

भईय्या प्रणाम ...
आओ अनुज, खुश रहो, कैसे हो !
ठीक हूँ भईय्या, एक बेहद गंभीर सामाजिक व धार्मिक टाईप की समस्या से कल सामना हो गया, मैं भी ज़रा भौंचक रह गया, और क्या जवाब देता यह भी नहीं समझ पाया !
अरे, क्या समस्या आ गई, वो भी तेरे जैसे समझदार आदमी के पास, हमें भी बताओ, क्या समस्या है !
हाँ भईय्या, हुआ दर असल यह कि कल रात मोहल्ले में एक लड़का जिसकी उम्र लगभग १८-१९ साल होगी, गुजर गया अर्थात स्वर्ग सिधार गया ... अब समस्या यहाँ पर ये आई कि उसके घर में छोटी-बड़ी उम्र के अनेक सदस्य हैं, कहने को भतीजा बड़ा है, और तो और पोते भी हो गए हैं ... कहने का मतलब यह है कि उम्र का कोई हिसाब-किताब नहीं है, अब आप तो समझते ही हो कि गाँव-देहात में बच्चे-पे-बच्चे होते रहते हैं, और शादियों -पे-शादियाँ भी ... मतलब रिश्ते में उम्र का छोटा-बड़ा रिश्ता अर्थात उम्र से भी बड़ा कभी कभी रिश्ता निकल आता है ... अब यहाँ पर समस्या यह है कि अग्निदाह संस्कार के बाद कौन कौन "मुंडन" कराएगा तथा कौन कौन नहीं कराएगा ... अर्थात सामाजिक व धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार "मुंडन" किसको कराना चाहिए और किसको नहीं कराना चाहिए, ये समस्या सामने आ के खड़ी हो गई !
हाँ, सच कहा, समस्या तो है पर उतनी गंभीर नहीं जितनी तुझे लग रही है !
भईय्या सिर्फ मुझे ही नहीं, कल रात को तो गाँव के चबूतरे पर चौपाल लगी थी उसमें यह मुद्दा उठ गया ... पर कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आया ... इसलिए ही मैं आज सुबह सुबह आपके पास आया हूँ ... अब आपके अलावा गाँव में और है कौन, जिससे समस्या का समाधान ... !
अरे, कोई भी पुराना आदमी बता देगा !
लगभग सभी पुराने, बुजुर्ग तो थे ही, फिर भी "कन्फ्यूजन" बना हुआ था ... अब आप ही बताओ, समाधान !
आ, पास आकर बैठ, और "कान खुजा के बैठ" ... एक ही बात बार बार नहीं बताऊंगा ... बात दर असल यह है कि "मुंडन संस्कार" की परम्परा लम्बे अर्से से चली आ रही है, अब इसके सामाजिक व धार्मिक तौर-तरीके क्या हैं वह तो मैं नहीं जानता, पर जितना सुना और जाना है मैंने, उसके अनुसार ही बता रहा हूँ ... तू मुझसे तर्क-वितर्क के हिसाब से कोई पोथी-पुराण संबंधी तथ्य मत पूंछने बैठ जाना, क्योंकि वह मैं नहीं दे पाऊंगा, वह तो कोई पंडित या शास्त्रों का जानकार ही बता पायेगा ... अगर तू "कान खुजा" के बैठ गया है तो सुन ... किसी भी बात को दोबारा नहीं बताऊंगा !
हाँ भईय्या ... आप बताओ ... कान भी खुजा लिए हैं और आँख भी मींड ली हैं !
बहुत बढ़िया ... तू काफी समझदार हो गया है, कान खुजाने के सांथ सांथ आँखे भी मींड कर बैठ गया है मतलब आँख और कान दोनों खुले रखेगा, शाबास ... तो सुन, सिर के बाल मानव शरीर में "साये" की तरह होते हैं अर्थात सुरक्षा-रक्षा के प्रतीक होते हैं, दूसरी तरह से कह सकते हैं मन, मस्तिष्क, आत्मा, सिर, के ऊपर "साया' के प्रतीक के रूप में होते हैं, सीधे शब्दों में कहूं तो "साया" होते हैं भले रक्षा कर पाएं या नहीं ... ठीक इसी प्रकार सामाजिक व पारिवारिक चलन में "रिश्ते" को "उम्र" से बड़ा माना गया है, फिर भले किसी की "उम्र" कम ही क्यों न हो पर यदि वह "रिश्ते" में बड़ा है तो "बड़ा" ही माना जाएगा ... तात्पर्य यह है कि अगर "चाचा" उम्र में छोटा है और "भतीजा" उम्र में बड़ा है इस स्थिति में "रिश्ते" के हिसाब से "चाचा" ही बड़ा माना जाएगा ... और जो रिश्ते में बड़ा है वह ही बड़ा रहेगा तथा सभी छोटों को उनके सामने झुकना पडेगा अर्थात अदब से पेश आना पडेगा, उनकी आज्ञा का पालन करना पडेगा ... अब हम तेरे सवाल पे आते हैं, किसी भी व्यक्ति के मरने पर उसकी "उम्र" को महत्त्व न देते हुए "रिश्ते" को महत्त्व दिया जाएगा अर्थाक मृतक व्यक्ति यदि "रिश्ते" में बड़ा है तो सभी "छोटे" लोगों को "मुंडन संस्कार" के दौरान रीति-नीति अनुसार अपने अपने सिर के बाल कटवाना चाहिए ... बाल कटवाने का सीधा-सीधा तात्पर्य यह है कि उसके ऊपर से एक "साया" का चला जाना ... अर्थात जिस व्यक्ति ने भी "मुंडन संस्कार" के दौरान सिर के बाल कटा कर "मुंडन" कराया है उसे देखते ही समाज के अन्य लोग समझ जायेंगे कि उसके सिर से एक सुरक्षा रूपी "साया" उठ गया है ... अर्थात हर उस व्यक्ति को जो मृतक से "रिश्ते" में छोटा है उसे निसंकोच सामाजिक व पारिवारिक मर्यादा के अनुसार "मुंडन" करा लेना चाहिए !!

Sunday, June 19, 2011

एक चिट्ठी ... अन्ना हजारे के नाम !

अन्ना जी, अरविंद जी
नमस्कार, जन लोकपाल के मसौदे पर मैं आपके विचारों व तर्कों से सहमत हूँ, पर जैसा अक्सर चर्चा-परिचर्चा पर देखने-सुनने मिल रहा है कि सरकार के कुछेक बुद्धिजीवी लोग ... प्रधानमंत्री व न्यायपालिका को लोकपाल से पृथक रखना चाहते हैं, इस मुद्दे पर आपने अपने जो विचार व तर्क प्रस्तुत किये हैं (मीडिया के माध्यम से) उन तर्कों से सहमत हूँ, पर सहमत होते हुए भी मेरी व्यक्तिगत राय है कि एक बार पुन: विचार करिए। प्रधानमंत्री व चीफ जस्टिस आफ सुप्रीम कोर्ट ... इन दो पदों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने में कोई बुराई नहीं है, इन दो पदों को लोकपाल के दायरे से पृथक रखा जा सकता है वो इसलिए कि जन लोकपाल के गठन के उपरांत सुचारू रूप से संचालन व क्रियान्वयन में ये दोनों पद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। क्यों, क्योंकि कोई भी ढांचा या इकाई तब ही सुचारुरूप से कार्य संपादित कर सकती है जब उसको मजबूत सपोर्ट हो, और इन दोनों पदों को जन लोकपाल के गठन व संचालन के लिए महत्वपूर्ण सपोर्ट के रूप में रखा जा सकता है। हम आशा करते हैं / आशा कर सकते हैं कि जब जन लोकपाल सुचारुरूप से कार्य संपादित करने लगेगा तब इन दोनों महत्वपूर्ण पदों पर निसंदेह ईमानदार व निष्पक्ष विचारधारा के व्यक्ति ही पदस्थ हो पाएंगे ( तात्पर्य यह है कि आज के समय में इन पदों पर आसीन लोगों पर जो उंगली उठ रही है या उठ जाती है, उसकी संभावना नहीं के बराबर रहेगी ) ... संभव है आप व आपसे जुड़े सभी सदस्यगण मेरे विचारों से सहमत न हों, पर मेरा आग्रह है कि एक बार गंभीरतापूर्वक विचार अवश्य करें !
शेष कुशल ... धन्यवाद !!
( विशेष नोट :- वैसे तो मुझे उम्मीद है कि ये दोनों पद भी लोकपाल के दायरे में स्वस्फूर्त आ जायेंगे तात्पर्य यह है कि ज्यादा मसक्कत नहीं करनी पड़ेगी )

Sunday, April 24, 2011

जन लोकपाल बिल : सवालों के कटघरे !

जन लोकपाल बिल को पारित किये जाने तथा जन लोकपाल के गठन को लेकर विगत दिनों अन्ना हजारे ने अपने समर्थकों व सहयोगियों के सांथ मिलकर दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर आमरण अनशन रूपी जन आन्दोलन किया, सरकार को अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की मांगे जायज तथा भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कारगर लगीं, परिणाम स्वरूप सरकार ने मांगों के अनुरूप जन लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग समीति का संवैधानिक तौर पर गठन किया । किन्तु समीति के गठन के उपरांत से ही राजनैतिक दलों के तथाकथित नेताओं तथा इलेक्ट्रानिक, प्रिंट व इंटरनेट मीडिया से जुड़े बुद्धिजीवी वर्ग ने तरह तरह के नकारात्मक सवाल उठाने शुरू किये, कहने का तात्पर्य यह है कि सवालों पे सवाल दागते हुए ड्राफ्टिंग समीति के सिविल सोसायटी के सदस्यों को सवालों के कटघरे में खडा करने का भरपूर प्रयास किया तथा प्रयास जारी भी है ।

सवाल उठाना व सवाल पे सवाल खड़े करना एक सीमा तक तो जायज हैं किन्तु जब ये सवाल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के समर्थन में न होकर अभियान को क्षत-विक्षित करने के भाव से उठ रहे हों तब तो ये सवाल अपने आप में चिंतनीय व निरर्थक ही कहे जा सकते हैं । जहां तक मेरा मानना है कि जब यह अभियान भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया है तब इस अभियान से जुड़े सिविल सोसायटी के सदस्यों पर सवाल पे सवाल दाग कर सवालों के कटघरे में खडा करने के पीछे का मकसद, अपने आप में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का समर्थन न होकर अप्रत्यक्ष रूप से अभियान का विरोध करना ही माना जाएगा । चलो कुछ देर के लिए हम मान लेते हैं कि सिविल सोसायटी के सदस्य दागदार छवी के हैं या होंगे, लेकिन इसका यह तात्पर्य तो कतई नहीं लगाया जा सकता कि उनकी मंशा इस भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को दागदार करने की है या होगी, फिलहाल तो यह सर्वविदित सत्य है कि इस समीति के गठन का मुख्य व प्रभावशाली उद्देश्य मजबूत व ठोस जन लोकपाल के गठन के लिए एक निष्पक्ष व पारदर्शी ड्राफ्ट तैयार करना जाहिर है ।

जहां तक मेरा मानना है कि जब तक जन लोकपाल ड्राफ्ट बिल का तैयार नहीं हो जाता तब तक इसके सदस्यों पर उंगली उठाना न्यायसंगत व व्यवहारिक नहीं होगा, वैसे भी सिविल सोसायटी के सदस्यों ने ड्राफ्टिंग कमेटी की मीटिंग्स की वीडियो रिकार्डिंग किये जाने का तर्क निष्पक्ष भाव से रखा था किन्तु उसे अस्वीकारते हुए आडियो रिकार्डिंग की अनुमति दी गई, इससे अपने आप में सिविल सोसायटी के सदस्यों की निष्पक्ष मंशा स्वमेव परिलक्षित हो जाती है । जब तक जन लोकपाल ड्राफ्ट तैयार होकर सामने नहीं आ जाता तब तक ड्राफ्टिंग कमेटी के किसी भी सदस्य पर सवाल उठाना लाजिमी नहीं होगा, जो तथाकथित महानुभाव सवाल पे सवाल खडा कर इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि उनका यह नकारात्मक अभियान जनता के समक्ष है तथा संभव है भविष्य में जन आक्रोश का उन्हें भी सामना करना पड़ सकता है, जहां तक मेरा मानना है कि यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान महज अन्ना हजारे या चंद लोगों का अभियान नहीं है वरन देश के हर उस एक एक आदमी का अभियान है जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग लड़ रहा है ।

यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझता हूँ कि जो लोग अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अर्थात जंतर-मंतर पर आयोजित आमरण अनशन कार्यक्रम के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं वे भली भांति जानते व समझते होंगे कि इस अभियान ने महज ३-४ दिनों में ही जो भयंकर रूप धारण कर लिया था उसे कोई साधारण अभियान नहीं माना जा सकता, और यदि कोई भी बुद्धिजीवी वर्ग इसे साधारण अभियान अर्थात आन्दोलन मान कर चल रहा है तो उसके आंकलन पर वह खुद ही सवालिया निशान लगा रहा है । भ्रष्टाचार के विरोध में जो जन आक्रोश व सैलाव उमड़ कर सामने आया था वह कतई नजर अंदाज किये जाने योग्य नहीं है, और यदि राजनैतिक दलों व मीडिया से जुड़े बुद्धिजीवी इस जन सैलाव व जन आक्रोश को अनावश्यक सवालों के माध्यम से दबाने या दिग्भ्रमित करने की चेष्ठा करते रहेंगे तो मेरा व्यक्तिगत आंकलन यह है कि उनकी यह दुर्भावनापूर्ण चेष्ठा कहीं आग में घी डालने का काम न करने लगे तथा परिणामस्वरूप भविष्य में जन आक्रोश का स्वरूप कहीं अधिक भयंकर रूप लेकर न उमड़ पड़े ।

जन लोकपाल का गठन वर्त्तमान भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की महज एक महत्वपूर्ण मांग नहीं कही जा सकती वरन यह कहना कहीं ज्यादा मुनासिब होगा कि यह मांग भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की एक मजबूत आधारशिला सिद्ध होगी, जन लोकपाल का गठन वर्त्तमान में देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटने व दोषियों को दण्डित किये जाने हेतु अत्यंत आवश्यक है, ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों पर सवाल पे सवाल दागने की अपेक्षा यह हितकर होगा कि ज़रा धैर्य रखा जाए तथा जन लोकपाल के गठन संबंधी ड्राफ्ट की रूप-रेखा की प्रतीक्षा की जाए । जन लोकपाल के गठन के पीछे किसी व्यक्ति या संस्था विशेष की कोई दुर्भावना रूपी मंशा नहीं है तथा जन लोकपाल के गठन की प्रक्रिया महज चंद लोगों के लिए लाभकारी न होकर वरन समूचे भारत वर्ष के लिए हितकर है अत: न सिर्फ राजनैतिक वरन मीडिया से जुड़े समस्त बुद्धिजीवी वर्ग को धैर्य का परिचय देते हुए भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सकारात्मक पहल का पक्षधर होना चाहिए ।

Wednesday, April 20, 2011

न्यायपालिका और जन लोकपाल !

भ्रष्टाचार ने लोकतंत्ररूपी ढाँचे को दीमक की तरह अपनी चपेट में ले लिया है, यह कहना आश्चर्यजनक नहीं होगा कि वर्त्तमान में लोकतंत्र के सभी धड़े भ्रष्टाचार की चपेट में हैं, लोकतंत्ररूपी ढाँचे का एक धडा 'न्यायपालिका' जिससे यह आम अपेक्षा रहती है कि यह धडा असामान्य हालात में भी निष्पक्ष रूप से कार्य संपादित करेगा किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विगत कुछेक वर्षों से न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रही है । न्यायपालिका जिसे न्याय का मंदिर कहा जाता है जहां अन्याय, दुर्भावनाएं, पक्षपात, भाई-भतीजावाद जैसे कृत्यों की अपेक्षाएं एक तरह से वर्जित हैं, किन्तु भ्रष्टाचाररूपी कीड़े ने इन समस्त वर्जनाओं को भी धवस्त कर दिया है, न्याय के मंदिर में भ्रष्टाचार ने जिस गति से प्रवेश व विस्तार किया है वह अपने आप में आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है । वर्त्तमान में भ्रष्टाचार की चपेट में न सिर्फ निचले स्तर की न्यायपालिकाएं वरन उच्च न्यायपालिकाएं भी अछूती नहीं कही जा सकती । लोकतंत्र के अति महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ 'न्यायापालिका' में समय समय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं सिर्फ आरोप ही नहीं लगते रहे वरन भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को समय समय पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही स्वरूप सेवा से निवृत भी किया जाता रहा है । सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोप लगना और भ्रष्टाचारियों को सेवा से निवृत कर देना या फिर भ्रष्टाचारियों को दंडात्मक कार्यवाही वतौर वर्त्तमान पद से रिवर्ट कर देना समाधानात्मक कार्यवाही है, वरन सवाल यह है कि न्याय के मंदिर में भ्रष्टाचार की जड़ें क्यों व कैसे फल-फूल रही हैं ।

न्यायपालिकाओं में भ्रष्टाचार की घुसपैठ अचंभित कर देने वाली अर्थात आश्चर्यजनक नहीं कही जा सकती, क्योंकि जब सारे के सारे लोकतंत्र में भ्रष्टाचार रूपी दानव विशालकाय रूप ले रहा हो तब लोकतंत्र का कोई भी एक धडा उससे अछूता कैसे रह सकता है । न्यायपालिकाओं में भ्रष्टाचार की घुसपैठ सामान्य व सहज कतई नहीं कही जा सकती, तात्पर्य यह है कि न्यायपालिकाओं में भ्रष्टाचार रूपी कीड़े ने सीधे दरवाजे से प्रवेश न करते हुए संभवत: दांय-बांय के रास्ते से प्रवेश करने का प्रयास किया है, कहने का तात्पर्य यह है कहीं न कहीं नियुक्तियां व पदस्थापनाएं इस भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती हैं । लोकतंत्र के अति महत्वपूर्ण स्तम्भ न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अत्यंत चिंतनीय व दुर्भाग्यपूर्ण है किन्तु इस अंग में भ्रष्टाचार के फैलाव के लिए न्यायपालिका को प्रत्यक्ष रूप से उतना जिम्मेदार नहीं माना जा सकता जितना कि वर्त्तमान सत्तारूढ़ राजनैतिक सिस्टम को अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार माना जाए, उसका कारण यह है कि न्यायपालिका के महत्वपूर्ण व प्रभावशाली पदों पर नियुक्तियां व पदस्थापनाएं सत्तारूढ़ राजनैतिक व्यवस्था के मंशा के अनुकूल ही होती रही हैं अत: यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि न्यायपालिकाओं में वर्त्तमान समय में भ्रष्टाचार के लिए सत्तारूढ़ राजनैतिक व्यवस्थाएं कहीं न कहीं अधिक जिम्मेदार मानी जा सकती हैं ।

लोकतंत्र रूपी ढाँचे के महत्वपूर्ण अंग न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अहम् व गंभीर मसला है अत: इस चर्चा के महत्वपूर्ण मुद्दे पर आते हैं असल मुद्दा यह है की वर्त्तमान में देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उद्देश्य से 'जन लोकपाल बिल' पर अहम् चर्चा चल रही है तथा इसी चर्चा के क्रम में तरह तरह के विचार सुनने व पढ़ने में आ रहे हैं इसी क्रम में न्यायपालिका में तथाकथित रूप से व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी अहम् चर्चा चल रही है कुछेक विद्धानों का मत है कि न्यायपालिका के सर्वोच्च पदों को इस बिल से पृथक रखा जाए तो कुछेक विद्धान इन पदों को भी जन लोकपाल के दायरे में रखने के पक्षधर हैं । यहाँ पर मेरा मानना यह है कि जब तक न्यायपालिका के महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों व पदास्थापनाओं में राजनैतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश रहेगी तब तक भ्रष्ट आचरण की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, यह दुर्भाग्य जनक स्थिति न सिर्फ न्यायपालिका वरन देश के किसी भी अन्य उच्च पदस्थ पद पर नियुक्तियाँ व पदस्थापनाएं जिनमें राजनैतिक हस्तक्षेप व प्रभाव रहेगा वहां गुंजाइश बनी रहेगी । अत: यह अत्यंत आवश्यक होगा कि न सिर्फ कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका वरन देश में संचालित समस्त आयोगों को भी जन लोकपाल के दायरे में रखा जाना जनहित में आवश्यक व महत्वपूर्ण होगा ।

Friday, April 15, 2011

फ्रांस में बुर्के पर प्रतिबन्ध जल्दबाजी का फैसला !

यूरोप के फ्रांस देश में विगत दिनों महिलाओं के बुर्के पहनने पर कानूनी रूप से रोक लगा दी गई है नए क़ानून के तहत सार्वजनिक स्थल पर बुर्का पहने पाए जाने पर १५० यूरो अर्थात ९००० रुपये के जुर्माने से दण्डित किया जाएगा । फ्रांस में निवासरत मुसलमानों ने इस निर्णय का कडा विरोध जाहिर किया है तथा आगे भी इस निर्णय का विरोध करने का फैसला लिया है, गौरतलब हो कि फ्रांस में लगभग ५० लाख मुसलमान रहते हैं जो किसी भी अन्य यूरोपीय देश की तुलना में अधिक हैं । कुछेक कट्टर समर्थकों ने इस फैसले का घोर विरोध किया है तो वहीं दूसरी ओर कुछेक लोगों का यह भी कहना है कि वे बुर्का पहनने का समर्थन नहीं करते किन्तु प्रतिबंधित किये जाने के फैसले से सहमत नहीं हैं ।

न सिर्फ फ्रांस में वरन समूचे विश्व में मुस्लिम महिलाओं में बुर्का पहनने की परम्परा है जो आज की नहीं वरन सदियों से चली आ रही परम्परा है, इसलिए मेरा मानना है कि यदि मुस्लिम महिलाएं स्वैच्छिक रूप से बुर्का पहनने को प्राथमिकता देती हैं तो इसे कतई प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए, सांथ ही सांथ यह भी गौर किये जाने वाली बात है कि २१ वीं शताब्दी में यदि जोर व दवाव पूर्वक महिलाएं बुर्का पहनने को मजबूर हैं तो यह मसला गहन विचारणीय है । ये माना कि वर्त्तमान समय में बढ़ रही आतंकी घटनाओं को ध्यान में रखते हुए तथा सुरक्षागत कारणों के मद्देनजर समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों को कड़े कदम उठाने पड़ते हैं किन्तु इसका यह मतलब कतई नहीं होना चाहिए कि सुरक्षा व एहतियात के लिए मानव अधिकारों की बली चढ़ा दी जाए ।

न सिर्फ फ्रांस वरन दुनिया के तमाम मुल्कों में तरह तरह की पोशाकें पहनने का रिवाज सदा-सदा से चला आ रहा है, खासतौर पर सिर्फ बुर्का ही नहीं वरन धोती, लुंगी, साड़ी, पगड़ी, इत्यादि ऐसे लिबास हैं जो सदियों से पहने जा रहे हैं जिनसे मानवीय, धार्मिक व सांस्कृतिक आस्था जुडी हुई है अत: इन लिबासों को तथा इसी तरह के अन्य लिबासों को एका-एक संदेह के दायरे में खडा कर देना लाजिमी नहीं होगा । वैसे मेरा मानना है कि सदियों से चली आ रही परम्पराओं पर एका-एक प्रतिबन्ध न लगाते हुए वर्त्तमान हालात व समस्याओं के मद्देनजर कुछेक दिशा निर्देश जारी किये जाने चाहिए जो वर्त्तमान समय तथा सदियों से चली आ रही परम्पराओं के बीच समन्वय स्थापित करें तथा एक सेतु की भांति सार्थक सिद्ध हों !

Wednesday, April 13, 2011

... पुरुष देख के खुश, तो महिला दिखा के खुश !

क्या औरत वही दिखा रही है जो पुरुष देखना चाहता है ....... या फिर वह जानती है कि कैसे पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित किया जाये .....क्यों ऎसे छोटे-छोटे ब्लाउज पहनना जिसमें से अधखुले-झलकते स्तनों की नुमाईस हो .... क्यों पूर्णरुपेण खुली हुई पीठ झलकॆ ... क्यों ऎसी मिनी स्कर्ट पहनना जिससे टांगें झलकें ..... क्यों इतने भीने-भीने कपडे पहनना जो लगभग पारदर्सी हों .... कहीं ऎसा तो नहीं ..... पुरुष देख के खुश, तो महिला दिखा के खुश !!!

.....इस भागम-भाग दौर में भला एक औरत दूसरी औरत से पीछे क्यों रहे .... उसे पीछे रहने की जरुरत भी क्या है ... अगर पीछे रह जायेगी तो "बहन जी" ..... बैकवर्ड ... या देहाती .... जैसे कांटों की तरह चुभने वाले "कमेंट" सुन सुन कर पानी पानी हो जायेगी ..... आज की कुछेक औरतें तो इतनी समझदार, चालाक व बुद्धिमान हो गई हैं कि वह जानती हैं .... पुरुषों को कैसे आकर्षित किया जाए ..... या फ़िर कैसे खुद को आकर्षण का केन्द्र बनाया जाये .... लेकिन जिस्म की इस तरह खुल्लम-खुल्ला नुमाईस .... कहीं ऎसा तो नहीं ..... पुरुष देख के खुश, तो महिला दिखा के खुश ......

.... औरत के पहने टाईट जींस-टी शर्ट से झलकते जिस्म, मिनी स्कर्ट में छलकती जांघें, अधखुले स्तनों, खुली पीठ व मादक अदाओं को देख कर ....... पुरुष सडक पर, बाजार में, समारोहों में, कार्यालयों में तथा आस-पडोस में आहें भरने से भला क्यों न बाज आये .... और तो और कुछ लोगों का तो दिन का चैन व रातों की नींद तक गायब हो जाती है ..... ये बिलकुल आम बात होते जा रही है कि वर्तमान समय में कुछेक महिलायें जान-बूझ कर ही ऎसे कपडे पहनने लगीं हैं कि उनके जिस्म की नुमाईस स्वमेव हो ....... आखिर क्यों, किसलिये, .... ऎसे उटपटांग .... भडकीले .... कामोत्तेजक कपडे पहनने की जरुरत ही क्या है .....कहीं ऎसा तो नहीं ..... पुरुष देख के खुश, तो महिला दिखा के खुश !!!

Tuesday, April 12, 2011

भ्रष्टाचार का बोलबाला !

भ्रष्टाचार का चारों ओर बोल-बाला है और-तो-और लगभग सभी लोग इसमे ओत-प्रोत होकर डूब-डूब कर मजे ले रहे हैं, आलम तो ये है कि इस तरह होड मची हुई है कि कहीं भी कोई छोटा-मोटा भ्रष्टाचार का अवसर दिखाई देता है तो लोग उसे हडपने-गुटकने के लिये टूट पडते हैं, सच तो ये भी है कि हडपने के चक्कर मे कभी-कभी भ्रष्टाचारी आपस में ही टकरा जाते हैं और मामला उछल कर सार्वजनिक हो जाता है और कुछ दिनों तक हो-हल्ला, बबाल बना रहता है .......फ़िर धीरे से यह मसला किसी बडे भ्रष्टाचारी द्वारा "स्मूथली" हजम कर लिया जाता है .... समय के साथ-साथ हो-हल्ला मचाने वाले भी भूल जाते हैं और सिलसिला पुन: चल पडता है !

भ्रष्टाचार की यह स्थिति अब दुबी-छिपी नही है वरन सार्वजनिक हो गई है, लोग खुल्लम-खुल्ला भ्रष्टाचार कर रहे हैं कारण यह भी है कि अब भ्रष्टाचार को "बुरी नजर" से नही देखा जा रहा वरन ऎसे लोगों की पीठ थप-थपाई जा रही है और उन्हे नये-नये "ताज-ओ-तख़्त " से सम्मानित किया जा रहा है।

भ्रष्टाचार के प्रमाण ..... क्यों, किसलिये ..... क्या ये दिखाई नही दे रहा कि जब कोई अधिकारी-कर्मचारी नौकरी में भर्ती हुआ था तब वह गांव के छोटे से घर से पैदल चलकर बस में बैठकर आया था फ़िर आज ऎसा क्या हुआ कि वह शहर के सर्वसुविधायुक्त व सुसज्जित आलीशान घर में निवासरत है और अत्याधुनिक गाडियों में घूम रहा है ..... बिलकुल यही हाल नेताओं-मंत्रियों का भी है ...... क्यों, क्या इन लोगों की लाटरियां निकल आई हैं या फ़िर इन्हे कोई गडा खजाना मिल गया है?

भ्रष्टाचार की दास्तां तो कुछ इतनी सुहानी हो गई है कि .... बस मत पूछिये.... जितनी भ्रष्टाचारियों की वेतन नही है उससे कहीं ज्यादा उनके बच्चों की स्कूल फ़ीस है ...फ़िर स्कूल आने-जाने का डेकोरम क्या होगा !!!!!!

Monday, April 11, 2011

भ्रष्टाचार : त्राहिमाम त्राहिमाम !

भ्रष्टाचार एक ऐसी जन समस्या है जिससे समूचा भारत वर्ष हलाकान है लगभग हरेक आम आदमी के जहन में भ्रष्टाचार का खौफ व्याप्त है कुछेक ख़ास लोगों को छोड़ दिया जाए तो समूचा देश त्राहिमाम त्राहिमाम है, भ्रष्टाचार कहने को तो एक समस्या ही है किन्तु मैं इसे एक साधारण समस्या न मानकर विकराल महामारी मान के चलता हूँ । ऐसा मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार एक महामारी है जिसकी चपेट में आकर बड़ी बड़ी योजनाएं, रूपरेखाएं, परियोजनाएं, साकार रूप लेने के पहले ही दम तोड़ती दिखाई देतीं हैं, इसके जीते जागते उदाहरण कामनवेल्थ गेम्स, आदर्श सोसायटी, २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले हैं । ये तो भ्रष्टाचार के बेहद साधारण उदाहरण हैं जिनकी चपेट में मात्र सरकारी धन का स्वाहा हुआ है, भ्रष्टाचार के असाधारण उदाहरण हम उन्हें मान सकते हैं जिनकी चपेट में आकर आम जनजीवन प्रत्यक्षरूप से प्रभावित होता है, ग्राम पंचायत, जनपद, नगर पंचायत क्षेत्र में चल रहीं सरकारी योजनाएं, नरेगा, पीएमजेएसवाय, मध्यान्ह भोजन, बीपीएल कार्ड योजना, आंगनबाडी केंद्र, इत्यादि योजनाओं में चल रहे तथाकथित भ्रष्टाचार की चपेट में सीधे तौर पर आम जनजीवन है । देश में शहरी व ग्रामीण दोनों क्षेत्र में भ्रष्टाचाररूपी वायरस फ़ैल चुका है जो दिन-ब-दिन लोकतंत्ररूपी ढांचे को क्षतिकारित कर रहा है, सिर्फ सरकारी क्षेत्रों में ही नहीं वरन व्यवसायिक व सामाजिक लगभग हरेक क्षेत्र में भ्रष्टाचार वृहद पैमाने पर फल-फूल रहा है, कालाबाजारी, जमाखोरी व मिलावटखोरी भी भ्रष्टाचार के ही नमूने हैं ।

भ्रष्टाचार रूपी महामारी पर जब जब चर्चा परिचर्चा होती है और वजह तलाशी जाती है कि आखिर इस महामारी की जड़ क्या है, कौन इसके लिए जिम्मेदार है, चर्चा शुरू तो होती है पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले ही दम तोड़ती नजर आती है, चर्चा का दम तोड़ना महज इत्तेफाक नहीं कहा जा सकता, वो इसलिए कि भ्रष्टाचार के लिए शुरुवाती स्तर पर भ्रष्ट राजनैतिक सिस्टम को जिम्मेदार ठहराया जाता है, फिर सरकारी मोहकमों को, फिर संयुक्तरूप से दोनों को अर्थात भ्रष्ट नेता-अफसर दोनों को जिम्मेदार माना जाता है, किन्तु चर्चा के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते पहुंचते भ्रष्टाचार के लिए आम जनता को दोषी ठहरा दिया जाता है, आम जनता को दोषी ठहराने के पीछे जो तर्क दिए जाते हैं वह भी काबिले तारीफ होते हैं। काबिले तारीफ़ इसलिए कहूंगा, तर्क यह होता है कि यदि जनता रिश्वत देना बंद कर दे तो भ्रष्टाचार स्वमेव समाप्त हो जाएगा अर्थात जनता रिश्वत न दे, रिश्वत मांगने वालों का विरोध करे, कालाबाजारी व मिलावटखोरी का विरोध करे, भ्रष्टाचार से जनता लड़े तो भ्रष्टाचार की हिम्मत ही कहां जो पांव पसार सके। सीधे तौर पर कहें तो चर्चा-परिचर्चा पर भ्रष्टाचार के लिए आमजन को ही जिम्मेदार मान लिया जाता है तात्पर्य यह कि देश में व्याप्त भ्रष्ट व्यवस्थाओं के लिए कहीं न कहीं आम जनता ही जिम्मेदार है।

भ्रष्टाचार के लिए प्रत्यक्ष रूप से आमजन को जिम्मेदार मानते हुए अक्सर यह तर्क भी दिए जाते हैं कि ट्रेन में सफ़र करते समय आम आदमी रिजर्वेशन के लिए २००, ३००, ४००, रुपये बतौर रिश्वत क्यों देता है यदि रिश्वत न दे तो ट्रेन में व्याप्त भ्रष्टाचार स्वमेव समाप्त हो जाएगा । ठीक इसी प्रकार सड़क पर जब किसी आम नागरिक की गाडी ट्रेफिक पुलिस द्वारा रोक ली जाती है तब आमजन १००, २०० रुपये दे-ले कर बच निकलने का प्रयास करता है और सफल भी हो जाता है, यहां पर तर्क यह दिया जाता है आमजन आखिर रुपये देता क्यों है ? तात्पर्य यहां भी वह ही भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है । इसी क्रम में जब आमजन को जाति प्रमाणपत्र या निवास प्रमाणपत्र बनवाने के लिए हजार, पांच सौ रुपये खर्च करने पड़ते हैं तब भी वह ही दोषी माना जाता है । हद की स्थिति यहां भी नजर आती है जब म्रत्यु प्रमाणपत्र बनवाने, पेंशन फ़ाइल को आगे बढ़वाने, इंश्योरेंश क्लेम के लिए, पोस्ट मार्डम के लिए तथा अन्य सभी तरह के प्रशासनिक कार्यवाहियों के क्रियान्वन के लिए रुपयों का जो अनैतिक लेन-देन होता है उसके लिए भी आमजन को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है ।

सच ! चलो कुछ पल को इन तर्कों को पढ़-सुन कर हम मान लेते हैं कि भ्रष्टाचार के लिए आमजन जिम्मेदार है सांथ ही सांथ यह सवाल भी उठता है कि इन गंभीर तर्कों को सुनकर हम आमजन को दोषी क्यों न मानें ! यहां पर मेरी विचारधारा व सोच इन तर्कों से ज़रा भिन्न है और आगे भी रहेगी, वजह यह है कि हम घटनाक्रम के सिर्फ एक पक्ष पर ध्यान दे रहे हैं कि आमजन ने रिश्वत के रूप में रुपये दिए हैं इसलिए वह जिम्मेदार है, किन्तु हम दूसरे पक्ष को नजर अंदाज कर देते हैं कि आमजन ने रुपये आखिर क्यों दिए ! क्या वह खुशी खुशी रुपये लुटा रहा था या उसके पास रुपयों की कोई खान निकल आई थी जिसे कहीं न कहीं तो खर्च करना ही था तो ऐसे ही सही, या फिर उसे कोई ऐसा अलादीन का जिन्न मिल गया था जो इस शर्त पर उसे रुपये दे रहा था कि आज के रुपये आज ही खर्च करने होंगे ! कुछ न कुछ ऐसी आश्चर्यजनक वजह तो जरुर ही होगी अन्यथा एक आम निरीह प्राणी क्यों रिश्वत देगा ! जहां तक मेरा मानना है कि उपरोक्त में से ऐसी कोई भी वजह नहीं है जिसके लिए आमजन को भ्रष्टाचार के लिए दोषी ठहराया जाए, मेरा स्पष्ट नजरिया यह है कि आमजन अर्थात अपने देश का एक आम आदमी, वर्त्तमान मंहगाई के समय में जिसके जीवन-यापन के खुद ही लाले पड़े हुए हैं वह बेवजह रुपये क्यों बांटेगा, वह हालात से तंग आकर, मजबूर होकर, व्यवस्था से त्रस्त होकर, मरता क्या न करता वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए किसी भी तरह के भटकने व विलंब से बचने के लिए तथा सांथ ही सांथ तरह तरह के मुश्किल हालात से बचने के लिए ही ले-दे कर अपना काम निपटाना चाहकर इस भ्रष्ट उलझन में उलझ जाता है । एक आम आदमी वर्त्तमान भ्रष्टाचार के लिए कतई जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, और न ही वह जिम्मेदार है, अगर कोई जिम्मेदार है तो वे ख़ास सक्षम लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बना कर रखा हुआ है ! इन हालात को बयां करता एक शेर - "मजबूरियों को भ्रष्टाचार का नाम न दो यारो / सच ! सीना तनने लगेगा भ्रष्टाचारियों का !"

Saturday, April 9, 2011

दुर्भावनाओं से ग्रसित नामी-गिरामी कलमकार !

हालांकि यह सवाल खडा करना कि कलमकार दुर्भावनाओं से ग्रसित होते हैं, खुद को सवालों के कठघरे में खडा करने जैसा है ! सवाल के उठने के सांथ ही आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ सकता है किन्तु आलोचनाओं से बचने या भागने के चक्कर में इस महत्वपूर्ण व ज्वलंत विषय पर लिखने से खुद को रोक पाना मुश्किल है ! वर्त्तमान समय में फेसबुक पर नए, उभरते, संघर्षशील, स्थापित, कलमकारों से अक्सर सामना पड़ते रहता है सामना पड़ने से तात्पर्य रु-ब-रु मुलाक़ात से नहीं है वरन उनके लेखन से सामना होने से है, जिसमें कवि, लेखक, आलोचक, समीक्षक, विश्लेषक, सभी तरह के कलमकार हैं जिसमें कुछेक मीडिया जगत से भी हैं !

फेसबुक पर सामान्यतौर पर छोटी-छोटी पोस्टों का चलन ज्यादा है दो लाइन, तीन लाइन में कलमकार जो उसकी मर्जी में आता है ठूंस देता है, प्रभावशाली कलमकारों के द्वारा ठूंस दी गई दो-तीन लाइनों को पढ़कर कभी कभी तो हंसी आ जाती है, हंसी इसलिए कि अगर कोई नया-नवेला कलमकार लिखे तो कोई बात नहीं किन्तु नामी-गिरामी लोग लिखें तो पढ़कर हंसी निकलना जायज है ! कभी कभी तो ऐसा लगता है कि इतना प्रतिष्ठित कलमकार और इतनी वाहियात लेखनी, जिसे पढ़कर अजीब सा महसूस हो, क्या करें वहां पर टिप्पणी की इच्छा होती है पर बड़ी मुश्किल से खुद को भिड़ने से रोकना पड़ता है, रोकना इसलिए कि यदि नहीं रुके तो टिप्पणी के परिणाम स्वरूप तना-तनी की पूर्णरूपेण संभावना रहेगी, तना-तनी न हो ये और बात है !

इस चर्चा के असल मुद्दे पर आते हैं कि कलमकार दुर्भावनाओं से ग्रसित हैं यह कैसे जान पड़ता है ! तो सुनिए, जब एक जाना-माना स्थापित कलमकार, क्रिकेट टीम में खिलाड़ियों के चयन पर जातिगत चर्चानुमा पोस्ट ठेल दे कि फंला जाती के लोगों को स्थान नहीं है फंला जाती के लोगों को महत्त्व ज्यादा मिल रहा है वगैरह वगैरह ! ठीक इसी प्रकार कोई स्थापित व चर्चित कलमकार यह पोस्ट लगा दे कि अन्ना हजारे के आन्दोलन का विरोध करते हैं, कोई यह लिखे कि जन लोकपाल के गठन से क्या भ्रष्टाचार मिट जाएगा, भईय्या कोई मुझे ये बताये कि क्रिकेट टीम के चयन में जात-पात की चर्चा का औचित्य क्या है, ठीक इसी प्रकार जब आप अन्ना हजारे जैसी सकारात्मक पहल नहीं कर सकते तो विरोध करने की जरुरत क्या है, भ्रष्टाचार मिटेगा या नहीं यह तो लोकपाल के गठन के बाद समझ आयेगा फिलहाल तो सारा का सारा देश भ्रष्टाचार की चपेट में है जब कोई सार्थक व सकारात्मक पहल हो रही है तब सवाल खड़े करने की जरुरत क्या है !

ठीक इसी प्रकार यह सर्वविदित सत्य है कि वर्त्तमान में अपने देश में ईमानदार लोगों को तलाशना कठिन काम है, अब जो लोग अन्ना हजारे के समर्थन में खड़े हैं वे कितने ईमानदार हैं या कितने बेईमान हैं इस सवाल को उठाने की जरुरत ही क्या है ! क्या बेईमान हैं तो अच्छे, सार्थक व सकारात्मक कार्य में योगदान नहीं दे सकते, जरुर दे सकते हैं और देना ही चाहिए, अभी तक किसी ने पहल नहीं की थी इसलिए बेईमान थे किन्तु अब इमानदारी के रास्ते पर चल पड़े हैं ! अब इन बुद्धिमान कलमकारों को कौन समझाये कि रातों-रात तो कोई काम हो नहीं सकता, सार्थक व सकारात्मक पहल तो करनी ही पड़ेगी, और जब कोई सार्थक व सकारात्मक कदम उठा रहा है तो उसमें नुक्ताचीनी की जरुरत क्या है ! मेरा तो ऐसा मानना है कि कलमकारों को जातिगत, राजनैतिक, व्यक्तिगत व सामाजिक दुर्भावनाओं से परे रहकर सार्थक व सकारात्मक लेखन की ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और यदि आलोचना करना जरुरी ही है तो सभी पहलुओं पर गंभीर मनन-चिंतन के बाद ही पहल करनी चाहिए, न कि क्षणिक वाह वाही के लिए जो मन में आये उसे ठोक दो !!

Friday, April 8, 2011

जन लोकपाल बिल : भ्रांतियों का दुष्प्रचार !

जन लोकपाल बिल को लेकर सारे भारत वर्ष में हलाकान मचा हुआ है, न्यूज चैनल्स, न्यूज पेपर्स, वेबसाईट, ब्लाग्स, फेसबुक, ट्वीटर, पत्रिकाओं, चर्चा मंचों तथा आमजन में बहस का मुद्दा बना हुआ है, जन लोकपाल बिल को लेकर चर्चा व चिंता जायज है किन्तु ऐसा देखने, सुनने, पढ़ने में आ रहा है कि जन लोकपाल बिल को लेकर जो चर्चा होनी चाहिए वह चर्चा का मूल केंद्र बिंदु न होकर मुद्दे से भटकाव की ओर है ! जन लोकपाल बिल को लेकर अब तक जो चर्चा देखने, सुनने, पढ़ने में मिल रही है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह बिल भ्रष्टाचार के विरुद्ध न होकर देश के संचालन को लेकर है यहाँ मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि जहां तक मेरा मानना है कि यह जन लोकपाल बिल देश के संचालन को लेकर नहीं है और न ही इसका हस्तक्षेप देश के प्रजातांत्रिक संचालन पर नकेल कसने को लेकर है, यह जन लोकपाल बिल स्पष्टरूप से, मूलरूप से भ्रष्टाचार के नियंत्रण को लेकर है।

जन लोकपाल बिल को लेकर सत्ता व सत्तासीन लोगों की चिंता जायज है कि कहीं यह बिल पारित होते ही देश के प्रजातांत्रिक संचालन में हस्तक्षेप न करने लगे, यह भी पढ़ने व सुनने में आ रहा है कि कहीं लोकपाल के पद पर बैठा व्यक्ति हिटलर की मानसिकता का निकल गया तो देश का संचालन अपने हांथ में लेकर देश का मुखिया बन कर बैठ जाएगा जिससे प्रजातांत्रिक ढांचा चरमरा जाएगा। ये विचार बुद्धिजीवी लोगों के मन में आना जायज है और आना भी चाहिए किन्तु उन बुद्धिजीवियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जन लोकपाल का ढांचा जो तैयार किया गया है अथवा संशोधन उपरांत जो ढांचा साकार रूप लेगा वह जन लोकपाल रूपी ढांचा देश के संचालन के लिए न होकर मात्र भ्रष्टाचार के नियंत्रण को लेकर होगा, सीधा सीधा तात्पर्य यह है कि जन लोकपाल सिर्फ, सिर्फ भ्रष्टाचार के नियंत्रण व भ्रष्टाचारियों पर दंडात्मक प्रकिया के संचालन के लिए होगा ।

जन लोकपाल बिल को लेकर उपजी या उपजाई जा रही भ्रांतियों को लेकर मेरा स्पष्टतौर पर ऐसा मानना है कि यह महज दुष्प्रचार है कि यह बिल पारित होते ही देश का प्रजातांत्रिक ढांचा चरमरा जाएगा और जन लोकपाल के पद पर बैठा व्यक्ति देश का सर्वे-सर्वा बन जाएगा, हिटलर बन जाएगा, तानाशाही करने लगेगा, ऐसा कतई नहीं होगा और न ही ऐसा होने की कोई गुंजाईश होगी । जन लोकपाल के पद पर बैठे व्यक्ति को लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के संचालन में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होगा, जब हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होगा तब वह किस अधिकार से हस्तक्षेप का प्रयास करेगा, यह महज दुष्प्रचार करने वाली बातें हैं ।

देश में संचालित कार्यपालिका, व्यवस्थापिका व न्यायपालिका के संचालन व नियंत्रण पर जन लोकपाल का कोई अधिकार व हस्तक्षेप नहीं होगा, अधिकार होगा तो सिर्फ इन व्यवस्थाओं में हो रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने पर होगा, भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने पर होगा । यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि लोकतंत्र के किसी भी अंग को भ्रष्टाचार व दुराचार करने की आजादी लोकतंत्र नहीं कही जा सकती, और यदि लोकतंत्र के किसी भी अंग में भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है तो उसके जिम्मेदार लोगों को दण्डित होना ही चाहिए फिर चाहे वे कार्यपालिका के हों, व्यवस्थापिका के हों या न्यायपालिका के ।

जन लोकपाल बिल का ढांचा भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन आन्दोलन के अगुवा व आमरण अनशन पर बैठे समाजसेवी अन्ना हजारे के सहयोगियों द्वारा तैयार किया गया है तथा उनकी मांग है कि देश से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए जन लोकपाल बिल का पारित किया जाना अत्यंत आवश्यक है, देश में बढ़ रहे निरंतर भ्रष्टाचार व घोटालों ने निश्चित ही देश को शर्मसार किया है कामनवेल्थ घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला ऐसे घोटाले हैं जिन्होंने भ्रष्ट सरकारों की कलई खोल कर रख दी है। अपने देश में भ्रष्टाचार व घोटालों की निरंतर बाढ़ आई हुई है, आमजन का जीना दुश्वार हुआ है, लोकतंत्र के सभी अंगों में भ्रष्टाचार जग जाहिर हैं, इन विकराल परिस्थितियों में जन लोकपाल बिल एक उम्मीद की किरण बनकर हमारे सामने है, सरकारों, जनप्रतिनीधियों, नौकरशाहों, बुद्धिजीवियों व समस्त मीडिया जगत को जन लोकपाल बिल का समर्थन करना चाहिए जिससे भ्रष्टाचार मुक्त समाज व राष्ट्र का निर्माण हो सके ।

Thursday, December 16, 2010

भ्रष्टाचाररूपी महामारी : असहाय लोकतंत्र !

भ्रष्टाचार वर्त्तमान समय में कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं रही वरन यह एक महामारी का रूप ले चुकी है महामारी से तात्पर्य एक ऐसी विकराल समस्या जिसके समाधान के उपाय हमारे हाथ में शायद नहीं या दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि इसकी रोकथाम के उपाय तो हैं पर हम रोकथाम की दिशा में असहाय हैं, असहाय से मेरा तात्पर्य भ्रष्टाचार होते रहें और हम सब देखते रहें से है।

भ्रष्टाचार में निरंतर बढ़ोतरी होने का सीधा सीधा तात्पर्य यह माना जा सकता है कि देश में संचालित व्यवस्था का कमजोर हो जाना है, यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि न्यायपालिका, कार्यपालिका व व्यवस्थापिका इन तीनों महत्वपूर्ण अंगों के संचालन में कहीं न कहीं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार का समावेश हो जाना है अन्यथा यह कतई संभव नहीं कि भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ता रहे और भ्रष्टाचारी मौज करते रहें।

यह कहना भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि भ्रष्टाचार रूपी महामारी ने लोकतंत्र की नींव को हिला कर रख दिया है ! ऐसा प्रतीत होता है कि लोकतंत्र के तीनों महत्वपूर्ण अंग न्यायपालिका, कार्यपालिका व व्यवस्थापिका एक दूसरे को मूकबधिर की भांति निहारते खड़े हैं और भ्रष्टाचार का खेल खुल्लम-खुल्ला चल रहा है। भ्रष्टाचार के कारनामे बेख़ौफ़ चलते रहें और ये तीनों महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं आँख मूँद कर देखती रहें, इससे यह स्पष्ट जान पड़ता है कि कहीं न कहीं इनकी मौन स्वीकृति अवश्य है !

एक क्षण के लिए हम यह मान लेते हैं कि ये तीनों व्यवस्थाएं सुचारू रूप से कार्य कर रही हैं यदि यह सच है तो फिर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी व मिलावटखोरी के लिए कौन जिम्मेदार है ! वर्त्तमान समय में दूध, घी, मिठाई लगभग सभी प्रकार की खाने-पीने की वस्तुओं में खुल्लम-खुल्ला मिलावट हो रही है, ऐसा कोई कार्य भर्ती, नियुक्ति व स्थानान्तरण प्रक्रिया का नजर नहीं आता जिसमें लेन-देन न चल रहा हो, और तो और चुनाव लड़ने, जीतने व सरकार बनाने की प्रक्रिया में भी बड़े पैमाने पर खरीद-फरोक्त जग जाहिर है।

भ्रष्टाचार, कालाबाजारी व मिलावटखोरी के कारण देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं हालात निरंतर विस्फोटक रूप लेते जा रहे हैं यदि समय रहते सकारात्मक उपाय नहीं किये गए तो वह दिन दूर नहीं जब आमजन का गुस्सा ज्वालामुखी की भांति फट पड़े और लोकतंत्र रूपी व्यवस्था चरमरा कर ढेर हो जाए, ईश्वर करे ऐसे हालात निर्मित होने के पहले ही कुछ सकारात्मक चमत्कार हो जाए और ये महामारियां काल के गाल में समा जाएं, वर्त्तमान हालात में यह कहना अतिश्योक्तोपूर्ण नहीं होगा की भ्रष्टाचार ने महामारी का रूप धारण कर लिया है और लोकतंत्र असहाय होकर उसकी चपेट में है !

Saturday, December 11, 2010

राहुल गांधी के विवादास्पद वक्तव्य में छिपे रहस्यमयी भाव !

हिन्दुस्तान में धर्म व जातिगत राजनीति कोई नया मुद्दा नहीं है आम बात है ! विगत दिनों मध्यप्रदेश दौरे पर टीकमगढ़ में कांग्रेस पार्टी के युवा सेनापति राहुल गांधी का यह स्टेटमेंट कि सिमी और आरएसएस दोनों एक जैसी विचारधारा के कट्टरवादी संघठन हैं, दोनों में वैचारिक तौर पर कट्टरता में कोई फर्क नहीं है, राहुल बाबा ने स्पष्ट तौर पर अपने समर्थकों के समक्ष यह कह दिया कि संघ व सिमी जैसी विचारधारा रखने वालों की कांग्रेस पार्टी में कोई जगह नहीं है हालांकि राहुल गांधी के भाषाई तेवर देखकर यह स्पष्ट झलक रहा था कि वे मध्यप्रदेश में दिग्विजयसिंह की बोली बोल रहे हैं। संघ की सिमी से तुलना करना निसंदेह एक विवादास्पद वक्तव्य कहा जा सकता है क्योंकि सिमी एक प्रतिबंधित संघठन है, और जो संघठन प्रतिबंधित हो उससे किसी जनसामान्य से जुड़े किसी संघठन की तुलना करना अपने आप में विवाद को जन्म देता है, खैर तुलनात्मक स्टेटमेंट, नासमझी, समझदारी, समर्थन, विरोध, परिपक्वता, अपरिपक्वता, ये अलग मुद्दे हैं इन मुद्दों पर चर्चा-परिचर्चा के लिए राजनैतिक दल सक्रीय व क्रियाशील हैं । हालांकि यह मुद्दा इतना बड़ा नहीं है कि इस पर चर्चा की जाए, लेकिन इस मुद्दे अर्थात राहुल गांधी के सिमी व आरएसएस के संबंध में दिए गए कथन के अन्दर छिपे रहस्यात्मक कूटनीतिक भाव पर चर्चा करना लाजिमी है, यहाँ पर रहस्यात्मक भाव से मेरा तात्पर्य जातिगत व धर्मगत राजनीति से परे है ।

जी हाँ, राहुल गांधी का यह विवादास्पद कथन ठीक उस समय आना जब अयोध्या स्थित रामजन्म भूमि - बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहावाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसला आने के फलस्वरूप कुछेक राजनैतिक दल फैसले के पक्ष अथवा विपक्ष में अपने अपने कथन जारी कर वोट की राजनीति कर रहे थे, जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को अयोध्या फैसले पर रोटी सेंकने का प्रयास न करते हुए शान्ति व सौहार्द्र बनाए रखने को तबज्जो देना चाहिए था जो परिलक्षित नहीं हुआ ! यहाँ विचारणीय बात यह है कि अयोध्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पहले ही बहुत राजनैतिक पैंतरेवाजी हो चुकी थी जो अब नहीं होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा न होते हुए लोगों ने पुन: इस मुद्दे को भुनाने की कसर नहीं छोडी। यह स्पष्ट तौर पर झलक रहा था कि अयोध्या मुद्दे के फैसले से कांग्रेस पार्टी को न तो कोई राजनैतिक लाभ था और न ही हानि, लेकिन दूसरे दलों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ न कुछ लाभ जरुर था, इस राजनैतिक लाभ-हानि के द्रष्ट्रीकोण से ही राहुल गांधी के स्टेटमेंट को आंका जा सकता है। हुआ दरअसल यह कि जब जातिगत व धर्मगत राजनीति अर्थात वोट की नीति की बात हो तथा कुछेक राजनैतिक दल मुद्दे को भुनाने की कोशिश करें तब कांग्रेस कैसे चुप रह सकती है, और चुप रहना राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से लाजिमी भी नहीं है !

अब हम राहुल गांधी के स्टेटमेंट में छिपे रहस्यात्मक भाव पर चर्चा करते हैं, अपने देश में हिन्दू हों या मुस्लिम हों दोनों ही भावनात्मक व व्यवहारिक रूप से दो हिस्सों में बंटे हुए हैं कुछ मंदिर-मस्जिद, जाति-धर्म की राजनीति के पक्षधर हैं तो कुछ घोर विरोधी भी हैं, ठीक यह स्थिति हिन्दू व मुस्लिम वर्ग में आरएसएस व् सिमी को लेकर भी है ! मेरा व्यक्तिगत तौर पर ऐसा मानना है कि हिन्दू वर्ग में ही कुछेक कट्टरपंथ विचारधारा के समर्थक हैं तो कुछ विरोधी भी हैं ठीक उसी प्रकार मुस्लिम वर्ग में भी समर्थन व विरोध की स्थिति है, कहने का तात्पर्य यह है कि मुस्लिम वर्ग में ही कुछेक सिमी का समर्थन करते हैं तो कुछ विरोध भी करते हैं, ठीक इसी तरह हिन्दू वर्ग में भी आरएसएस का समर्थन व विरोध दोनों है ! राजनैतिक द्रष्ट्रीकोण से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिन्दू वर्ग व मुस्लिम वर्ग में साफ्ट कार्नर रखने वाला वह हिस्सा जिसे जातिगत व धर्मगत वोट की राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, न तो वह किसी के समर्थन में है और न ही किसी के विरोध में है, अब सवाल यह है कि इस वर्ग अर्थात हिस्से को कौन व् कैसे भावनात्मक व रहस्यात्मक ढंग से अपनी ओर खींचे !! यह वह वर्ग अर्थात हिस्सा है जिसे मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम युक्त कट्टर राजनीति से कोई लेना-देना न होकर शान्ति व सौहार्द्र से लेना-देना है, इस वर्ग को देश में एक ऐसी राजनैतिक पार्टी की जरुरत है जो अमन-चैन व शान्ति-सौहार्द्र की पक्षधर हो ! कहीं ऐसा तो नहीं राहुल गांधी के इस स्टेटमेंट में यही रहस्यात्मक भाव छिपा हुआ है तथा इस स्टेटमेंट के माध्यम से इस वर्ग विशेष का समर्थन जुटाने का भरपूर प्रयास किया है !!
( नोट :- यह लेख दिनांक - १० अक्टूबर २०१० को लेखबद्ध किया गया था जो विलम्ब से यहाँ प्रस्तुत है ! )