Wednesday, November 2, 2011

मरने के बाद

अब मैं बहुत याद आऊँगा
बहुत ही जियादा याद किया जाऊंगा
क्यों, क्योंकि -
मैं अब मर गया हूँ
है न कुछ अजब विडम्बना
कि -
मैं जीते जी कम याद किया गया
मरने के बाद -
बहुत ही जियादा याद किया आऊँगा
देख लो, याद आ रहा हूँ
मरते ही सबको याद आ रहा हूँ
याद आते रहूंगा ...
जन्मदिन के बहाने
जन्म शताब्दी के बहाने
पुण्यतिथि के बहाने
अक्सर गोष्ठी-संगोष्ठी होते रहेंगी
मेरे नाम पर ...
मैं एक ऐंसी साहित्यिक दुनिया का -
जीव, निर्जीव रहा हूँ
जहां -
अक्सर मरने के बाद
याद किये जाते हैं
पूजे जाते हैं, किसी न किसी बहाने ... !!

आदत

कब तक बैठे रहें
हम इंतज़ार में उनके
और कब तक देते रहें,
दिलासा खुद को
कि -
वो आएंगे, आ रहे होंगे ...
बहुत हुआ अब इंतज़ार, उनका !
जी चाहता है
क्यूं न
आज से ही आदत बदल ली जाए
गर वो आ गए, दस मिनट में
तो ठीक है
वरना
बेहिचक, कोई और
नंबर घुमा लिया जाए !!

सुलगती आग

सच ! मुझे न थी खबर
कि -
मेरा अस्तित्व सूखी लकड़ी सा भी है
कभी सोचा भी नहीं था
कि -
जिस दिन जलूँगी, बस जलते रहूँगी
हाँ, याद है वो रात, जब तुमने
कड़कड़ाती ठण्ड में
माचिस की तिली से सुलगाया था मुझे
तिली के स्पर्श ने -
मुझे भभका दिया था
तब से अब तक सुलगी हुईं हूँ
कभी दबे अंगार की तरह
तो कभी भभकती आग की तरह
फर्क होता है तो सिर्फ
तुम्हारे होने, और न होने का
तुम्हारे होने पर -
भभकतीसुलगती
दहकती
आग होती हूँ
और न होने पर दबा अंगार होती हूँ ... !!