Sunday, June 5, 2011

प्रगतिशील गाँव !

हमारा गाँव ...
एक प्रगतिशील गाँव है
लगातार ... दिन-ब-दिन तरक्की कर रहा है
तरक्की ऐसी, कि कागजों में पुरजोर है
पर ... तरक्की की आड़ में
भ्रष्टाचार का महाजोर है
हमारा सरपंच ... सब के सब पंच
और उनके आला अफसर, कर्ता-धर्ता
भ्रष्टाचार के नए नए आयाम रच रहे हैं
गुल-पे-गुल खिला रहे हैं
खूब घोटाले ... गड़बड़झाले कर रहे हैं
समय समय पर ... पंचायती मेला लगा कर
वेतन, भत्ते, बंगला, गाडी, फोन, फैक्स
इत्यादि भौतिक सुख-सुविधाओं का
खुद-ब-खुद ... खुद के लिए
भरपूर इंतजाम कर ले रहे हैं
योजनाओं, परियोजनाओं और विदेशी दौरों की आड़ में
खूब सरकारी धन लुटा रहे हैं
सारी दुनिया ... अब ... हमारे गाँव को
घोटालों का गाँव ... के नाम से
जानने - पहचानने लगी है
क्यों, क्योंकि ... साल में
दो - चार नामी-गिरामी पंच
कर्म तो सभी के हैं ... पर दो-चार
जरुर ... कालकोठरी में पहुँच रहे हैं
खुशनसीबी ... पंचों की आड़ में
सरपंच ... बार बार बच निकल जा रहा है
हमारा सरपंच ... सच माना जाए तो
गड़बड़झालों का असल 'मास्टर माइंड' है
गाँव की त्रस्त और पस्त आत्माएं
त्राहीमाम-त्राहीमाम कर रही हैं
और मस्त आत्माएं ... मस्त-ही-मस्त हैं
छोटी-मोटी आत्माएं, आवाजें
दफ़न कर दी ... कुचल दी जा रही हैं
गाँव के लोग डरे, सहमे हुए हैं
आवाज उठाने से भी डरने लगे हैं
डरते हैं ... कहीं ... कोई उन्हें
दबोच न दे ... मुरकेट न दे
गाँव का आलम ... पूछों ... मत पूछों
मस्त, मस्त हैं ... और त्रस्त, त्रस्त हैं
फिर भी ... हमारा गाँव ... एक प्रगतिशील गाँव है !!

Thursday, June 2, 2011

मुक्त कर दे !

हे भगवन
तेरी लीला भी अपरंपार है
रोज, कैसे कैसे
चमत्कार हो रहे हैं
भ्रष्ट, भ्रष्ट, भ्रष्टतम भ्रष्ट
अजर - अमर हो रहे हैं
सिर्फ अजर - अमर होते
तो चल भी जाता ... पर
ये सब ... रक्तबीज हो रहे हैं
ये जहां-जहां जाते हैं
जिन राहों से गुजरते हैं
इनके कदम, कदमों के निशां
रोज, हर रोज
नए-नए ... हष्ट-पुष्ट भ्रष्टाचारियों को
जन्म दे रहे हैं
अब बता ... तू ही बता ... कुछ तो बता
ये तेरी कौन-सी माया है
क्या मांजरा है, क्या होनी-अनहोनी है !
क्यों ... और कब तक
असहाय, दयालू, भोले-भाले, निरीह, जनमानुष
इनके नापाक इरादों की भेंट चढ़ते रहेंगे !
बोल ... बता ... कुछ तो बता
हे भगवन
कब तक तू ... यूं ही खामोश रहेगा
या फिर ... कहीं तूने ... अपने कानों में
रुई तो नहीं ठूंस रखी है
यदि रुई ठूंस रखी है ... तो फिर कोई बात नहीं !
यदि कान खुले रखे हैं ... तो सुन
उठाले, मार दे, नष्ट कर दे
इन दरिंदों को, रक्तबीजों को
या फिर ... इन
निरीह, दयालू, भोले-भाले, असहाय जनमानुष को
तू ... अपने हांथों से
जला कर राख कर दे ... इन्हें
इनके नारकीय जीवन, संसार से
मुक्त कर दे - मुक्त कर दे !!

Wednesday, June 1, 2011

नालायक !

भईय्या ... अब मैं
बहुत लायक हो गया हूँ
आप बेवजह ही मुझे
सुबह से शाम तक , सारा दिन
नालायक ... नालायक, कहते रहते हो
अब ... आप मुझे
लायक कहना शुरू कर दीजिये !
अरे वाह ... बहुत खूब ... कैसे
भईय्या ... आप तो देख ही रहे हो कि -
अब मैं ... दिन में एकाद तो
लायकी के काम करने ही लगा हूँ
आपने देखा ... परसों
टेबल से जमीन पर
जलती चिमनी गिर गई थी
पूरे घर में, आग लग सकती थी
त्वरित ही मैंने
खूंटी पे टंगे कोट से
आग बुझा दी थी ... और कल रात
मुझे आईडिया आया तो मैंने
दूध की गंजी के ढक्कन को
खुला छोड़ दिया था
आपने देखा ... रोज की तरह
बिल्ली ... भले ही दूध ...
पी कर चली गई ... पर
गंजी को जमीन पर नहीं गिरा पाई
अब आप ... मेरी पीठ ठोकिये
और कुछ इनाम दे ही दीजिये
लाइये ... लाइये ... कुछ इनाम दीजिये
चुप ... नालायक कहीं के ...
तू ... नालायक का नालायक ही रहेगा !!